HAL vs IAF खतरे में भारत की आसमानी सुरक्षा, राजनाथ सिंह जागो

HAL vs IAF खतरे में भारत की आसमानी सुरक्षा, राजनाथ सिंह जागो

HAL vs IAF रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और एनएसए अजित डोभाल कृपया ध्यान दें- भारतीय वायुसेना स्वदेशी ट्रेनर जेट्स की कमी से जूझ रही है। दुश्मन तीन दिशाओं से हमला कर सकते हैं।  हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल्स अब भी सफेद हाथी बना हुआ है। वायुसेना का शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुका है। स्वदेशी ट्रेनर जेट्स न होने के कारण मैन फाइटर जेट्स को ट्रेनिंग में लगाना पड़ रहा है। ट्रेनिंग के तीन चरणों में से एक को समाप्त किए जाने पर विचार किया जा रहा है। इससे वायुसेना की युद्ध कुशलता पर प्रभाव पड़ सकता है।

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पुराने और रिटायर्ड ट्रेनर जेट इस्तेमाल करने से पायलट्स के जीवन पर संकट बना रहता है। वायुसेना की निर्भरता आयातित ट्रेनर जेट्स पर बढ़ रही है। ट्रेनिंग पर्याप्त और समुचित न होने के कारण वायु सेना में कुशल पायलटों का अभाव हो सकता है।

स्वदेशी ट्रेनर जेट्स की कमी ने भारतीय वायु सेना ट्रेनिंग प्रक्रिया को बाधित किया है। वायुसेना को अपने पायलटों की ट्रेनिंग में गुणवत्ता से समझौता करना पड़ रहा है। जिससे भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट की युद्धक क्षमता की धार कमजोर पड़ने की आशंका है। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

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भारतीय वायुसेना के पिछले 50 साल का इतिहास पर निगाह डालिए…। भारतीय वायुसेना में हाईप्रोफाइल वॉर मशीनें शामिल की गई हैं। इनमें जगुआर, मिराज-2000, Su-30MKI, LCA तेजस, राफेल, C-130J सुपर हरक्यूलिस, C-17, चिनूक और अपाचे शामिल हैं। लेकिन किसीने HT-2, HPT-32 और HJT-16 किरण के बाद किसी भी स्वदेशी डिजाइन पर विकसित और निर्मित प्रशिक्षण विमानों की ओर ध्यान दिया? तो जवाब है नहीं।

दोष हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का है। दोष सरकार का भी है। एचएएल पर ही क्यों निर्भर है? इन विषम परिस्थितियों में भारतीय वायुसेना पायलट ट्रेनिंग में बहुत मुश्किलें और जोखिम उठाना पड़ रहा है। आप पूछेंगे कि स्वदेशी फाइटर जेट न होने की दशा में भारतीय वायुसेना के पायलटों की ट्रेनिंग कैसे दे रही है। इस सवाल का जवाब इस तरह दिया जा सकता है-
उदाहरण के लिए अगर किसी स्कूल में 10वीं के बाद 11वीं की पढ़ाई न हो और बच्चों को सीधे 12वीं में डाल दिया जाए, कुछ ऐसा ही वायु सेना के साथ हो रहा है। हेलिकॉप्टर और मालवाहक जहाज उड़ाने वाले नए पायलटों को ‘बीच की ट्रेनिंग’ नहीं मिल पा रही है क्योंकि उसके लिए विमान ही नहीं हैं। वे सीधे बुनियादी विमान से बड़े जहाजों पर जा रहे हैं।

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पुराने ‘किरण’ विमान अब रिटायर होने वाले हैं। उनकी जगह लेने के लिए ‘सितारा’ (HJT-36) नाम का विमान बनना था, जिसका नाम अब ‘यशस’ कर दिया गया है। लेकिन सालों की मेहनत और सुधारों के बावजूद वायु सेना अभी भी इस विमान से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।

शुरुआत में वायु सेना इस नए विमान को बड़ी संख्या में खरीदने वाली थी, लेकिन अब वायुसेना इस विमान को लेने से कतरा रही है। क्यों कि वायुसेना के नेतृत्व को लगता है कि कहीं इसमें और पैसा फंसाना बेकार न चला जाए। इसलिए अब वो कह रहे हैं कि पहले हम इसे अच्छी तरह जांचेंगे, फिर फैसला करेंगे।

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ट्रैनर विमान बनाने वाली कंपनी एचएएल कहती है कि वायु सेना बार-बार अपनी मांगें बदल देती है, इसलिए देरी हुई। वहीं वायु सेना का मानना है कि कंपनी एक बुनियादी ट्रेनिंग विमान भी समय पर नहीं बना पाई। तेजी से बदल रहे समय के साथ नए तौर-तरीकों और तकनीकि से युक्त विमानों की जरूरत है। वायुसेना इन्हीं आवश्यकताओं से एचएएल को अवगत कराती रही है। एचएएल भारतीय वायुसेना की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है।

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भारतीय वायु सेना और एचएएल के बीच इस खींचतान की वजह से नए पायलटों की ट्रेनिंग का पूरा सिस्टम बिगड़ रहा है और भारत को बाहर से महंगे विमान खरीदने पड़ रहे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, हमारे पास लड़ाकू विमान (जैसे राफेल) तो बहुत आधुनिक हैं, लेकिन उन्हें वाले पायलटों को प्रशिक्षित करने वाला ट्रेनिंग सिस्टम बहुत कमजोर है।

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ऑपरेशन सिंदूर टू प्वांट ओ क्या इसी तैयारी के साथ अंजाम दिया जाएगा? कैसे निपटेंगे आग उगलते ड्रैगन से? रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जागिए! उंगलियां घुमाकर दुश्मन को जवाब नहीं दिया जाता, लड़ाकू जहाजों को कलाबाजियां खिलानी पड़ती हैं…!! डोभाल साहब इंटेल मिल जाएगी लेकिन एक्जीक्यूशन कैसे होगा…? यूएस-इजरायल-ईरान युद्ध से सीख ली? सीख तो ली होगी, उसे क्रियान्वित और कार्यान्वित भी करो।

 

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