Raghav Chadha भारत की मौजूदा राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले मोटा भाई यानी अमित शाह क्या पूर्व के बाद पंजाब में भी कमल खिलाने जा रहे हैं। सियासी संकेत बता रहे हैं कि आम आदमी पार्टी का सूर्य अस्त होने जा रहा है। पंजाब की आम आदमी पार्टी वाली भगवंत मान सरकार पर गंभीर संकट के बादल छाए हुए हैं। इन्हीं बादलों को चीर बीजेपी में नए-नए शामिल हुएगौरव चड्ढा पंजाब के नए मुख्यमंत्री हो सकते हैं। चंडीगढ़ से लेकर दिल्ली के बीच क्या ख्वाबी खिचड़ी पक रही है, आईए डालते हैं उस पर एक नज़र-

राजनीति में सत्ता के समीकरण ताश के पत्तों की तरह बिखरते देर नहीं लगती। पंजाब, जहाँ 2022 में आम आदमी पार्टी (AAP) ने 117 में से 92 सीटें जीतकर एक ‘इंकलाब’ का दावा किया था, आज वही राज्य एक अभूतपूर्व सियासी भूचाल के मुहाने पर खड़ा है। सांसद राघव चड्ढा किसी जमाने में आम आदमी पार्टी के ब्लू आईड ब्यॉय कहे जाते थे, लेकिन कुछ ही दिनों में आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े विलन बन गए। राघव चड्ढा (Raghav Chadha) राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के छह अन्य सांसदों के साथ बीजेपी में शामिल हुए वैसे ही आम आदमी पार्टी की उस नींव को हिला दिया है जिस पर भगवंत मान की सरकार टिकी थी। अब कयास यह नहीं हैं कि क्या सरकार गिरेगी या बचेगी, चर्चाएं यह हैं कि चंजीगढ़ सचिवालय के सरकारी दफ्तरों में किसी भी दिन कमल छाप परचम फहरा सकता है।
पंजाब सरकार की पॉलिसीज को तय करते थे राघव चड्ढा (Raghav Chadha)
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री भले ही भगवंत मान रहे लेकिन अरविंद केजरीवाल के बीहाफ पर राघव चड्ढा (Raghav Chadha) ही पॉलिसी मेकिंग में आखिरी डिसीजन लेते थे। राघव चड्ढा के ग्रीन सिग्नल के बाद ही भगवंत मान कैबिनेट बुलाते और फैसलों पर मुहर लगाते थे। राघव चड्ढा न केवल सरकार के सलाहकार थे, बल्कि आम आदमी पार्टी के मुख्य रणनीतिकार और ‘किंगमेकर’ भी थे। पंजाब में आम आदमी पार्टी के 92 विधायकों में से अधिकांश पर नियंत्रण राघव चड्ढा का ही चलता था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज भी अपरोक्ष नियंत्रण राघव चड्ढा का ही है।
अब जबकि राघव चड्ढा (Raghav Chadha) स्वयं बीजेपी के पाले में जा चुके हैं, तो भगवंत मान सरकार की ‘आत्मा’ ही गायब हो गई है। वह रणनीतिकार, जिसने विधायकों को बनाया, अब उनके भविष्य की नई स्क्रिप्ट बीजेपी के दफ्तर में लिख रहा है। यह पंजाब में सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी और पहली कड़ी मानी जा रही है।

पंजाब विधान सभा 65 विधायकों का गणित
राजनीतिक गलियारों में खुसफुसाहट है कि पंजाब के 65 विधायक राघव चड्ढा के माध्यम से बीजेपी आलाकमान के सीधे संपर्क में हैं। इस सम पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। बहुमत के लिए सरकार को 59 विधायकों की जरूरत है। आम आदमी पार्टी 92 विधायक हैं। राघव चड्ढा (Raghav Chadha) के संपर्क वाले 65 विधायकों को निकाल दिया जाए तो भगवंत मान के साथ केवल 37 विधायक ही बच रहे हैं। इस आंकड़े से तो पंजाब से भगवंत मान सरकार के दिन लद चुके हैं। साथ ही राघव चड्ढा के संपर्क वाले विधायकों पर दल बदल विरोधी कानून भी लागू नहीं होगा। क्यों कि भगवंत मान सरकार गिराने और आम आदमी पार्टी तोड़ने के लिए 63 विधायकों की जरूरत है जबकि राघव चड्ढा के साथ 65 विधायक बताए जा रहे हैं।
इस तरह राघव चड्ढा का नेतृत्व स्वीकार करने वाले विधायक एंटी-डिफेक्शन लॉ (दलबदल विरोधी कानून) के तहत भी वे अयोग्य नहीं होंगे क्योंकि यह संख्या आप के कुल 92 विधायकों के दो-तिहाई की संख्या से अधिक है। तकनीकि तौर पर देखा जाए तो राघव चड्ढा (Raghav Chadha) का मामला सेट है। मगर, पंजाब में तखता पलट को अभी तक हरी झण्डी क्यों नहीं दी गई है, यह एक बड़ा सवाल है।
कहा जा रहा है पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे और वहां सरकार का गठन बीजेपी नेतृत्व के लिए पंजाब से भी बड़ा टास्क है। इसलिए पंजाब में पाला बदल का खेल 4 मई के बाद शुरू होगा।

आम आदमी पार्टी की वित्तीय और रणनीतिक रीढ़ टूट चुकी है
किसी भी पार्टी के लिए उसका ‘फायनेंसर’ और ‘इलेक्शन मैनेजर’ उसके दो हाथ होते हैं। पंजाब में आप के मुख्य फायनेंसर और वो नेता जो टिकट वितरण के समय सर्वे और फंडिंग का जिम्मा संभालते थे, अब बीजेपी के सिपाही बन चुके हैं।
राघव चड्ढा (Raghav Chadha) के साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल और संजीव अरोड़ा जैसे नामों का बीजेपी में जाना यह सिद्ध करता है कि आम आदमी पार्टी का पंजाब मॉडल अब भीतर से खोखला हो चुका है। जब पैसा और रणनीति दोनों विपक्ष के पास चले जाएं, तो सत्ताधारी पार्टी के पास केवल ‘मजबूरी’ बचती है।
भगवंत मान बनाम दिल्ली दरबार
भगवंत मान सरकार के गिरने का एक बड़ा कारण अरविंद केजरीवाल का ‘सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल’ भी है। पंजाब के विधायक लंबे समय से इस बात से नाराज हैं कि उन्हें छोटे-छोटे काम के लिए भी दिल्ली की ओर देखना पड़ता है। अगर राघव चड्ढा मुख्यमंत्री बनते हैं तो विधायकों में विश्वास पैदा होगा कि अब दिल्ली की मर्जी नहीं चलेगी बल्कि दिल्ली दिल लगी वाली बातें होंगी। केंद्र से पंजाब को आर्थिक राहत जल्दी मिलेगी। बीजेपी में शामिल होने से उन्हें न केवल केंद्र का समर्थन मिलेगा, बल्कि पंजाब के विकास के लिए सीधा फंड भी मिलेगा। विधायक-मंत्री अपनी क्षेत्र की जनता से किए गए वादों को आसानी से और समय पर पूरा कर पाएंगे।

पंजाब विधानसभा के 10 महीने बाकी
राघव चड्ढा के मुख्यमंत्री बनने की राह में केवल एक ही अड़चन है वो यह कि पंजाब सरकार का कार्यकाल केवल 10 महीने का ही बचा है। अगर इस अड़चन का समाधान बीजेपी आलाकमान ने सोच लिया है तो एक मई भगवंत मान सरकार का आखिरी दिन हो सकता है। फिर असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के नतीजों का इंतजार नहीं किया जाएगा। भगवंत मान भी जल्दबाजी में हैं उन्होंने 1 मई को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है। शायद वो भी चाहते हैं कि अगले दस महीने चैन से रह कर अगले चुनाव की तैयारी की जाए। राघव चड्ढा के गुब्बारे की हवा निकाल कर या फिर पांच साल की नाकामियों को 10 महीने की (संभावित) सरकार पर थोप कर।
अरविंद केजरीवाल का सियासी अवसान
अगर एक मई को भगवंत मान सरकार गिर जाती है तो संकट केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहेगा अरविंद केजरीवाल को भी ले डूबेगा। पंजाब आम आदमी पार्टी के हाथ से निकलता है, तो यह अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा।
पंजाब ही एकमात्र राज्य हौ जहाँ आम आदमी पार्टी की सरकार है। इसे खोने का मतलब है अरविंद केजरीवाल की कथित वैकल्पिक राजनीति का खात्मा हो जाना। केजरीवाल आइसोलेशन में चले जाएंगे। राघव चड्ढा जैसे करीबी सिपहसालार का छोड़ना केजरीवाल के नेतृत्व पर सवाल उठाता है। यह संदेश गया है कि केजरीवाल ने भरोसेमंद साथियों की टोली को खो दिया।

कंट्रोवर्सी में केजरीवाल का कंट्रोल मॉडल
बहरहाल, राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के बीजेपी में विलय से पंजाब की राजनीति में मचे उथल-पुथल ने न केवल सत्ता के समीकरण बदल दिए हैं, बल्कि आम आदमी पार्टी के गवर्नेंस मॉडल पर भी गहरे सवाल खड़े किए हैं। भगवंत मान सरकार पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि पंजाब की मशीनरी और संसाधनों का उपयोग दिल्ली दरबार की सुख-सुविधाओं और राजनीतिक विस्तार के लिए किया जा रहा है। अब, गौरव चड्ढा के नेतृत्व में हुए विद्रोह और रणनीतिकारों के पाला बदलने के बाद, यह साफ हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के ‘ऐश’ के दिन खत्म होने वाले हैं।
अरविंद केजरीवाल ने खूब मौज उड़ाई
पंजाब के सरकारी संसाधन केजरीवाल की निजी शान शौकत और शेघी बघारने में इस्तेमाल होते रहे हैं।पंजाब में सत्ता संभालने के बाद से ही मुख्यमंत्री भगवंत मान की स्थिति एक ‘पिछलग्गू’ जैसी रही है। इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरण सामने आए हैं:
- सरकारी विमान का दुरुपयोग: अरविंद केजरीवाल ने देश के विभिन्न राज्यों (गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान) के चुनावी दौरों के लिए पंजाब सरकार के विमान और हेलिकॉप्टर का धड़ल्ले से उपयोग किया। केजरीवाल ने पंजाब के जहाजों का उपयोग ‘निजी टैक्सी’ की तरह किया।
- सुरक्षा का भारी काफिला: केजरीवाल जब भी पंजाब जाते हैं, तो पंजाब पुलिस के सैकड़ों कमांडो और दर्जनों गाड़ियों का काफिला उनके साथ चलता है। होशियारपुर में उनके विपश्यना शिविर के दौरान २३ गाड़ियों का काफिला और भारी सुरक्षा बल तैनात करना इसका ज्वलंत उदाहरण है, जो एक आम आदमी की सादगी का दावा करने वाले नेता के लिए विरोधाभासी है।

पंजाब पुलिस का राजनीतिक हथियार के रूप में दुरुपयोग
अरविंद केजरीवाल ने पंजाब पुलिस का उपयोग अपने उन आलोचकों को चुप कराने के लिए किया जो दिल्ली में बैठकर उनके खिलाफ आवाज उठाते थे। पंजाब पुलिस, जो नशीली दवाओं और सीमा पार के अपराधों से लड़ने के लिए बनी है, उसका उपयोग केजरीवाल के आलोचकों को गिरफ्तार करने के लिए किया गया।
आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे कुमार विश्वास ने जब केजरीवाल पर अलगाववादियों के साथ संबंधों के आरोप लगाए, तो पंजाब पुलिस ने रूपनगर में उनके खिलाफ भड़काऊ बयान देने की एफआईआर दर्ज कर दी और उनके घर तक पुलिस भेज दी।
दिल्ली के बीजेपी नेता तेजिंदर सिंह बग्गा को उनके घर से गिरफ्तार करने के लिए पंजाब पुलिस ने नाटक किया वो सारी दुनिया ने देखा। दिल्ली और हरियाणा पुलिस के हस्तक्षेप से उन्हें वापस लाया गया।
कांग्रेस नेता अलका लांबा के खिलाफ भी रूपनगर में मामला दर्ज किया गया क्योंकि उन्होंने केजरीवाल की नीतियों की आलोचना की थी।

पंजाब के प्रशासन पर ‘केजरीवाल’ का कब्जा
पंजाब के प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकें अरविंद केजरीवाल दिल्ली में लेते रहे हैं, जो संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। भगवंत मान की मौजूदगी के बिना पंजाब के मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों का दिल्ली जाकर केजरीवाल को रिपोर्ट करना यह साबित करता है कि पंजाब की डोर चंडीगढ़ से नहीं, बल्कि दिल्ली से खिंची जा रही थी।
पंजाब की धरती हमेशा से बड़े बदलावों की गवाह रही है। आज जो स्थिति बनी है, वह स्पष्ट संकेत दे रही है कि भगवंत मान की सरकार केवल कुछ दिनों की मेहमान है। राघव चड्ढा का ‘मास्टरस्ट्रोक’, 65 विधायकों की डोलती निष्ठा और बीजेपी की अचूक रणनीति ने पंजाब के राजनीतिक नक्शे को बदलने की तैयारी पूरी कर ली है।
यह न केवल पंजाब में सत्ता का परिवर्तन-प्रयोग होगा, बल्कि भारतीय राजनीति के अराजक अध्याय- आम आदमी पार्टी के समापन का उद्घोष भी हो सकता है।
