Nirmal Mahato के शव पर सवार हो प्रभात खबर पहुंचे थे Harivansh?

Nirmal Mahato के शव पर सवार हो प्रभात खबर पहुंचे थे Harivansh?

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो (Nirmal Mahato) की लाश पर पैर रख बहुत सारे लोग सियासी मुकाम हासिल करते गए। मगर संसद की सीढ़ियां कौन चढ़ा और सर्वोच्च आसंदी पर आसीन कौन हुआ? इस कहानी को बहुत कम लोग जानते हैं, दो-एक दिल्ली में हैं एक महाराष्ट्र में…। चूंकि मैंने कहानी को सुना है इसलिए आपको भी सुनाता हूँ…

हरिवंश (Harivansh) नारायण सिंह- मीडिया स्कॉलर, सोशलिस्ट एक्टिविस्ट, पूर्व बैंक कर्मी, युग धर्म, साप्ताहिक रविवार और फिर प्रभात खबर..प्रभात खबर से सीधी छलांग देश की संसद के उच्च सदन राज्यसभा में लगाई और सर्वोच्च सदन की सर्वोच्च आसन तक पहुंचे।

Nirmal Mahato
Nirmal Mahato

देखने में बड़ा ही सहज लगता है कि लगता है बलिया के छोटे से गांव से निकला एक सामान्य बालक हरिवंश (Harivansh), काशी हिंदू विश्वविद्यालय पहुंचता है फिर उसकी महत्वाकांक्षा मायानगरी मुंबई ले जाती है। जीवन की आवश्यकताएं बैंक में नौकरी करने को विवश करती हैं। बैंक में करियर छोटा ही रहा। युवा हरिवंश वापस जर्नलिज्म की ओर मुड़ा। धर्मयुग जैसे संस्थानों से होते हुए कोलकाता से छपने वाले साप्ताहिक रविवार को ठौर बनाया। साप्ताहिक रविवार में उन दिनों सम्पादक थे उद्यन शर्मा।

इस कहानी में थोड़ा से पेंच है। यही वो पेंच है जिसने हरिवंश (Harivansh) नारायण सिंह को ‘माननीय उप सभापति’ की कुर्सी तक पहुंचाने में अहम् भूमिका निभाई है। क्योंकि हरिवंश नारायण सिंह के जीवन में यह पेंच न आया होता तो वो नीतीश कुमार के विशेष कृपापात्र नहीं बन पाते।

दरअसल, हरिवंश (Harivansh) बैंक ऑफ इंडिया की नौकरी छोड़ने या निकाले जाने के बाद सीधे साप्ताहिक रविवार नहीं पहुंचे थे।

हरिवंश मुंबई-कोलकाता-रांची-पटना और दिल्ली में नौकरी नए ठिकाने की तलाश कर रहे थे। रांची- हरिवंश (Harivansh) नारायण सिंह की ससुराल भी है। इसी समय पत्रकार साथी सुनील श्रीवास्तव और विजय भास्कर ने हरिवंश की मुलाकात रांची से प्रकाशित होने वाले प्रभात खबर के प्रधान संपादक एसएन विनोद से करवाई। उस समय, एसएन विनोद खांटी और खुर्राट संपादक माने जाते थे। एसएन विनोद ने हरिवंश का इंटरव्यू लिया। हरिवंश, एसएन विनोद के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। सुनील श्रीवास्तव और विजय भास्कर भी वहीं बैठे थे।हरिवंश (Harivansh) को बाहर इंतजार करने को कहा गया। तीनों (एसएन विनोद  सुनील श्रीवास्तव और विजय भास्कर) ने चर्चा के बाद तय किया कि हरिवंश प्रभात खबर में चीफ सब एडिटर की भूमिका के उपयुक्त नहीं हुआ कि हरिवंश रीजेक्ट कर दिए गए। रीजेक्ट होने की टीस हरिवंश के दिल की गांठ बन गई। इसके बाद हरिवंश कोलकाता पहुंचे। उदयन शर्मा का सान्निद्धय मिला और साहित्य का कॉलम इत्यादि देखने लगे।

तारीख 7 अगस्त 1987 थी। समय लगभग दोपहर के 12 बजे, जमशेदपुर के चमडिया गेस्ट हाउस में लगभग 50 लोग पहुंचे थे। यह जुटान निर्मल महतो के निमंत्रण पर हुआ था। निर्मल महतो (Nirmal Mahato) ने प्रचार के लिए एक विशेष रथ बनवाया था। यह रथ एनटी रामाराव के प्रचार रथ की हू-ब-हू बनवाया गया था। बिहार की सियासी हलकों में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का रथ कौतुहल का विषय था। ज्ञानरंजन, एसएन विनोद, सुनील कुमार, विधायक, नेता और पत्रकार सभी लोग उसी रथ को देखने के लिए चमडिया गेस्ट हाउस के पोर्टिको में खड़े हुए थे। रथ यू टर्न लेकर चमडिया गेस्ट हाउस के पोर्टिको में आने वाला था।

इसी समय पोर्टिको के पार सड़क पर एक एमबेसेडर कार आकर रुकती है। एमबेसेडर से उतर कर तीन लोग हाथों में असलह लेकर निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) की ओर बढ़ते हैं। जान पर खतरे को भांप कर निर्मल महतो  निर्मल महतो (Nirmal Mahato) ने सुनील सिंह के पीछे छिपने की कोशिश की। निर्मल महतो ने कातर सुर में सुनील भैया हमें बचा लो…! सुनील सिंह ने निर्मल महतो को बचाने की बजाए निर्मल महतो को असलबंद लोगों के आगे ठेल दिया। इन बेखौफ लोगों ने पचासों लोगों के सामने निर्मल महतो को गोलियों से छलनी कर दिया। निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) की हत्या करने के बाद तीनों आराम से टहलते हुए वापस एमबेसेडर में बैठे और चले गए।

निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) की हत्या का दृश्य देखने वालों में से भी कई लोगों के पास असलह थे। कुछ लाइसेंसी और कुछ गैर लाइसेंसी…मगर हत्यारे निर्मल महतो पर गोलियां बरसाने वालों का प्रतिरोध किसी ने नहीं किया। जब वो लोग एमबेसडर में बैठकर चमडिया गेस्ट हाउस से चले गए तो पीछे से कुछ लोगों ने हवाई फायरिंग करने का नाटक जरूर किया।

यहां दो बातें खास बतानी हैं।

पहली यह कि इस घटना से कुछ महीने पहले एसएन विनोद प्रभात खबर संपादन और स्वामित्व को छोड़ चुके थे। ज्ञानरंजन  विज्ञान प्रकाशन और प्रभात खबर के प्रोपराइटर बन चुके थे।

दूसरी बात, निर्मल महतो को सरे आम दिन-दहाड़े मौत के घाट उतारने वाले लोग, कुछ घण्टे पहले भी चमडिया गेस्ट हाउस आए थे और ज्ञानरंजन से एकांत में मुलाकात की और चले गए। गेस्ट हाउस के जिस कमरे में ज्ञानरंजन ठहरे हुए थे उससे अगला कमरा निर्मल महतो का था…!

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) हत्याकाण्‍ड की खबर जंगल में आग की तरह पूरे बिहार और आस-पास के सूबों फैल गई। कई जगह बवाल और हिंसा भी हुई। अगले दिन 9 अगस्त के अखबार निर्मल महतो हत्याकाण्ड की खबरों से रंगे हुए थे। पटना से प्रकाशित होने वाले नवभारत सहित सभी अखबारों में निर्मल महतो हत्याकाण्ड पहले पेज की पहली लीड खबर थी। हत्याकाण्ड की साजिश में शक की सुई प्रभात खबर के प्रोपराइटर ज्ञानरंजन की ओर थी। कोलकाता से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक रविवार के 9 से 15 अगस्त वाले अंक में भी निर्मल महतो हत्याकाण्ड पर कवर स्टोरी छापी गई थी। इस स्टोरी में शक की सुई ज्ञानरंजन की ओर थी। उस समय साप्ताहिक रविवार के बिहार ब्यूरो चीफ जयशंकर गुप्ता थे। निर्मल महतो हत्याकाण्ड की कवर स्टोरी उन्होंने ही भेजी थी।

साप्ताहिक रविवार सहित सभी अखबारों छपी खबरों से ज्ञानरंजन घबरा गए। उन्होंने अपने मित्र संपादक उद्यन शर्मा से संपर्क किया। ज्ञानरंजन और उदयन शर्मा के संबंध बहुत अच्छे थे। यह भी चर्चा थी कि 1985 में चौधरी चरण सिंह की दलित मजदूर किसान पार्टी के टिकट पर उदयन शर्मा ने आगरा में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था तो ज्ञानरंजन ही उनके वित्त पोषक थे।

ज्ञानरंजन के आग्रह पर उदयन शर्मा ने कोलकाता से हरिवंश नारायण सिंह को निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) हत्याकाण्ड की पड़ताल के लिए भेजा। हरिवंश ने अपने ही स्टेट ब्यूरो चीफ जयशंकर गुप्ता की स्टोरी का खण्डन करते हुए कवर स्टोरी प्रकाशित करवा दी। साप्ताहिक रविवार की इस कवर स्टोरी का बिहार की पत्रकार बिरादरी में बहुत विरोध हुआ। जयशंकर गुप्ता तो इसी के विरोध स्वरूप साप्ताहिक रविवार से इस्तीफा दे दिया।

जगन्नाथ मिश्रा उस समय बिहार के चीफ मिनिस्टर थे। निर्मल महतो हत्याकाण्ड में पुलिस और ज्ञानरंजन जैसे रसूखदार लोगों की संदिग्ध भूमिका   लेकर बहुत बवाल मचा हुआ था। बहुत अधिक दबाव बनने के बाद जगन्नाथ मिश्रा ने जांच सीबीआई को सौंप दी।

सीबीआई ने जिन चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज किए थे उनमें एसएन विनोद भी एक थे। चश्मदीद गवाहों के बयान और साप्ताहिक रविवार में हरिवंश (Harivansh) की कवर स्टोरी को आधार मानते हुए सीबीआई ने ज्ञानरंजन को क्लीन चिट दे दी। कहा जाता है कि सीबीआई से क्लीन चिट मिलने के बाद ज्ञानरंजन ने हरिवंश के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और कहा कि समय आने पर वो अहसान जरूर चुकाएंगे।

ज्ञानरंजन के विषय में एक छोटी सी कहानी और।

1984 में विज्ञान प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले एसएन विनोद के स्वामित्व में शुरू हुए प्रभात खबर की हनक बहुत कम समय में ही दिल्ली दरबार तक सुनी जाने लगी थी। विज्ञान प्रकाशन में चार पार्टनर थे। एसएन विनोद और उनकी पत्नी शोभा प्रसाद तथा ज्ञान रंजन और उनकी पत्नी विभा रंजन। 1985 आते-आते ज्ञानरंजन को अहसास होने लगा कि एसएन विनोद का ‘पत्रकारीय औरा’ उनके सियासी वजूद पर भारी पड़ रहा है। ज्ञानरंजन ने साजिशन फाइनेंशियल क्रंच के बहाने विज्ञान प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर में एक अन्य व्यक्ति को पिछली गली से घुसा दिया गया। एसएन विनोद के पास सब कुछ था, मगर गोयनका जैसा समृद्ध व्यावसायिक पार्श्व भी नहीं था। ज्ञानरंजन पॉवर ब्रोकर थे। प्रभात खबर के संचालन को लेकर विवाद हुआ। ज्ञानरंजन ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि या तो एसएन विनोद कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाएं या संपादन और स्वामित्व छोड़ कर प्रभात खबर से अलग हो जाएं। एसएन विनोद ने प्रभात खबर और विज्ञान प्रकाशन को कोर्ट कचहरी में खड़ा करने वाली शर्मनाक स्थिति से बचने के लिए  उसका त्याग करना ही बेहतर समझा। प्रभात खबर को एसएन विनोद ने अपने खून-पसीने से सींच कर पाला पोषा और बड़ा किया था। बहरहाल, एसएन विनोद प्रभात खबर से अलग हो गए। एसएन विनोद और ज्ञानरंजन के दो प्रमुख मध्यस्थ अंबिकानंद सहाय और मोहन सहाय की ओर से अंतिम समझौता पत्र में दो शर्तें शामिल करवाई गईं। पहली यह कि प्रभात खबर के मास्टहेड के नीचे संस्थापक संपादक एसएन विनोद छापा जाएगा और दूसरी शर्त यह कि भविष्य में जब भी प्रभात खबर के स्वामित्व परिवर्तन से संबंधित कोई भी डील होगी वो एसएन विनोद की लिखित सहमति के बिना नहीं हो सकेगी।

ज्ञानरंजन तो प्रभात खबर पर फौरी तौर पर एकाधिकार चाहते थे। इसलिए उन्होंने एसएन विनोद की दोनों शर्तें तुरंत स्वीकार कर लीं। पत्रकारिता के उच्चमानदण्ड स्थापित करने वाला प्रभात खबर अब ज्ञानरंजन के सियासी करियर की ढाल बन गया।

एसएन विनोद रांची से नागपुर शिफ्ट हो गए। किसी भी मीडिया संस्थान को उसको चलाना बहुत मुश्किल होता है। पग-पग पर कांटे होते हैं। गई। दो साल से ही कम समय में प्रभात खबर डगमगाने लगा। अखबार का प्रसार और प्रतिष्ठा निम्म स्तर पर पहुंच गए। अपने अखबार की ये हालातों की खबर टेलीफोन पर सुनकर एसएन विनोद कहते थे कि ज्ञानरंजन एक दिन इसे बेच कर पैसे बना लेगा।

दिन तेजी से बीतने लगे। निर्मल महतो हत्याकाण्ड लोगों के दिल-दीमाग से निकलकर कानून की गलियों में भटक चुका था। दो साल बाद, अक्टूबर 1989 को ज्ञानरंजन ने प्रभात खबरे की कमान हरिवंश नारायण को सौंप दी। हरिवंश नारायण सिंह अब उस प्रभात खबर के संपादक थे जिसमें कभी वो चीफ सब एडिटर पद के लिए रिजेक्ट कर दिए गए थे। जी हां, वही हरिवंश नारायण सिंह, जिनकी साप्ताहिक रविवार में प्रकाशित कवर स्टोरी पर ज्ञान रंजन को निर्मल महतो हत्याकाण्ड में क्लीन चिट मिली थी। ज्ञानरंजन ने हरिवंश नारायण सिंह से अहसान चुकता किया और प्रभात खबर का संपादक बनाकर वादा भी पूरा कर दिया।

प्रभात खबर को बेचे जाने की खबरें मार्केट में तेजी से फैल रहीं थीं। इसी बीच झाबर ग्रुप के लाली बाबू ने नागपुर फोन लगाकर एसएन विनोद से संपर्क किया और प्रभात खबर खरीदने की इच्छा जताई। एसएन विनोद ने कहा कि झाबर ग्रुप प्रभात खबर का संचालन संभाल ले तो इससे अच्छा क्या होगा। लाली बाबू ने कहा मगर यह तब तक संभव नहीं है जब तक आप लिखित सहमति न दो।

पुराने सहयोगियों के तमाम दबाव के विपरीत एसएन विनोद ने लाली बाबू को लिखित एनओसी भेज दी। एसएन विनोद का तर्क था कि प्रभात खबर बंद हो जाए इससे बेहतर है चलता रहे भले ही कोई भी चलाए। लाली बाबू के उषा मार्टिन ग्रुप ने प्रभात खबर का अधिग्रहण कर लिया। अब कमान विज्ञान प्रकाशन प्रकाशन से न्यूट्रल पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड के हाथों में जा चुकी थी। एक शर्त बरकरार थी संस्थापक संपादक एसएन विनोद निरंतर छपता रहेगा।

प्रभात खबर को उषा मार्टिन ने खरीद लिया मगर हरिवंश संपादक बने रहे। कुछ समय तक संस्थापक संपादक एसएन विनोद भी छपता रहा, मास्टहेड के नीचे नहीं लेकिन प्रिंट लाइन के साथ। हरिवंश को यह नाम हमेशा चुभता रहता था। नए मालिक और नए मालिक के आने के बाद एक दिन सही समय देखकर हरिवंश ने प्रिंट लाइन से संस्थापक संपादक एसएन विनोद वाली लाइन ही हटा दी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि एसएन विनोद खुद भी हरिवंश के नाम के साथ प्रिंट लाइन में अपना नाम देख कर खुश नहीं थे।

उस समय संघीय सरकार में उठा-पटक का दौर चल रहा था। चंद्र शेखर 10 नवंबर 1990 को भारत के प्रधानमंत्री बने तो हरिवंश नारायण सिंह प्रभात खबर को छोड़ प्रधानमंत्री के सूचना सहायक होकर पीएमओ में पदास्थापित हो गए। 21 जून 1991 को चंद्रशेखर ने इस्तीफा दिया तो हरिवंश वापस प्रभात खबर के संपादक की कुर्सी पर बैठ गए। हरिवंश नारायण दूरदर्शी हैं। जेपी आंदोलन से ही चंद्रशेखर को लगातार फॉलो करने वाले हरिवंश ने ज्ञानरंजन से भी ‘बहुत कुछ’ सीखा।

सियासत और सहाफत के प्रसंग-संदर्भ में जहां भी चंद्रशेखर का जिक्र आता है तो रामबहादुर राय के नाम की चर्चा जरूर होती है। चंद्र शेखर के प्रधानमंत्री बनने पर रामबहादुर राय जो चाहते वो पद हासिल कर सकते थे। एनडीए की पहली सरकार यानी अटल सरकार में उन्होंने राजनीतिक पद-लाभ वाले प्रस्तावों को बड़ी विनम्रता से ठुकरा दिया था। एनडीए की दूसरी सरकार यानी मोदी सरकार में पद्मश्री पुरस्कार मिला। इंद्रागांधी कला केंद्र का अध्यक्ष पद भी समाज के प्रति शेष जिम्मेदारियों को निभाने के लिए संभाला। पद्मभूषण पुरस्कार तो सरकार ने उन्हें उनके कार्यालय पहुंच कर दिया।

वापस हरिवंश (Harivansh) नारायण सिंह पर लौटते हैं। उनके मेंटॉर ज्ञानरंजन अब इस दुनिया में नहीं थे। चंद्रशेखर की राजनीति का सूरज भी अस्ताचल की ओर था। लालू यादव के घपले-घोटाले वाले शासन से ऊब चुके बिहार में नीतीश कुमार नाम का सूरज उदय हो रहा था। नीतीश कुमार को ऐसा सहयोगी चाहिए था जो जनता को बता सके कि नीतीश सिर्फ सीएम नीतीश कुमार नहीं बल्कि सुशासन कुमार हैं। वहीं प्रभात खबर के हरिवंश को भी एक ऐसे सियासी सहारे की जरूरत थी जो उनके ‘मुस्तकबिल’ को मजबूती देता रहे। निर्मल महतो की लाश पर सवारी करके जिस सफर में हरिवंश नारायण निकले थे उसको जारी रखने के लिए नीतीश कुमार जैसे चपल चीफ मिनिस्टर का साथ जरूरी था।

हरिवंश के संपादकत्व में ‘प्रभात खबर’ ने नीतीश कुमार को सुशासन कुमार के नाम से नई पहचान दी। नीतीश कुमार अहसान चुकाने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने हरिवंश नारायण को जदयू कोटे से सीधे राज्यसभा भेजकर अहसान की पहली किश्त चुकाई। फिर उन्हें राज्यसभा का उपसभापति बनवाकर अपना हक पूरा अदा कर दिया।

रांची से उठकर हरिवंश का राज्य सभा के सभापति बनने तक दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए। पहला- एनडीए छोड़ राजद की ‘लालटेन की लाइट’ में नीतीश मुख्य मंत्री बने। यह एनडीए के साथ ही हरिवंश को झटका था। आसंदी पर तलवार लटकी थी। दलीय नैतिकता कहती थी हरिवंश को उप सभापति से इस्तीफा देना चाहिए था। ऐसा होता तो एनडीए को बिहार और केंद्र दोनों में एक साथ झटका लगता। एक तरफ बिहार की लालटेन की टिमटिमाती रोशनी और दूसरी ओर दिल्ली की चकाचौंध…! बुजर्गियत की ओर बढ़ रहे हरिवंश दूरदर्शी हैं। उन्होंने हवा का रुख देखा और राज्यसभा की आसंदी त्यागने से इंकार कर दिया। हरिवंश दूरदर्शिता सही साबित हुई। नीतीश भी एनडीए में वापस आ गए और चीफ मिनिस्टर भी बन गए। हरिवंश भी राज्यसभा के उप सभापति भी बने रहे। किंतु उन्होंने राज्यसभा की आसंदी त्याग देते तो फिर सिंहासन चढ़ना असंभव होता।

दूसरा घटनाक्रम- राज्यसभा के सभापति धनखड़ के अविश्वास प्रस्ताव आया गिरा। फिर ऐसे हालात पैदा हुए कि संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही 21 अगस्त 2025 की रात इस्तीफा देना पड़ा। हरिवंश (Harivansh) की ‘निष्ठा’ बेदाग रही। उपसभापति होने के अधिकार से हरिवंश सदन में जहां चाहते वहां अपनी सीट सुरक्षित कर सकते थे, मगर एनडीए के घटक दल का होने के बाद भी हरिवंश अपने कार्यकाल के अंतिम दिन तक नेता प्रतिपक्ष मलिकार्जुन खड़गे के बगल में बैठे नजर आए। हरिवंश नारायण सिंह को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अगले छह साल के लिए राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर दिया है।

आज से लगभग चालीस साल पहले निर्मल महतो निर्मल महतो (Nirmal Mahato) की लाश पर सवारी करने वालों का रांची से सर्वोच्च सदन तक का सफर आज भी जारी है…!

सुना है प्रभात खबर की प्रिंट लाइन में संस्थापक-संपादक एसएन विनोद फिर से छपना शुरु होगा क्या!

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