Jabalpur RTO परिवहन विभाग का बहुचर्चित फ्लाइंग कांड अब सिर्फ अवैध वसूली या प्राइवेट दखल का मामला नहीं रह गया है—यह सीधे-सीधे प्रशासनिक जवाबदेही और सिस्टम की साख की परीक्षा बन चुका है। 25 मार्च को हुई लोकायुक्त की कार्रवाई ने जिस नेटवर्क की परतें खोलीं, अब उसी कार्रवाई के दौरान फ्लाइंग प्रभारी राजेंद्र साहू की भूमिका सबसे बड़े सवाल के रूप में सामने खड़ी है।
सबसे अहम और चौंकाने वाला प्रश्न—जब लोकायुक्त की टीम ने छापा मारा, उस वक्त फ्लाइंग प्रभारी आखिर थे कहां? नियम साफ कहते हैं कि ऐसी कार्रवाई में वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी अनिवार्य होती है। ऐसे में यदि प्रभारी मौके से गायब थे, तो यह महज अनुपस्थिति नहीं, बल्कि पूरे ऑपरेशन की वैधता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल है।
और यहीं से मामला और ज्यादा विस्फोटक हो जाता है। सूत्रों के मुताबिक, प्रभारी की गैरमौजूदगी में फ्लाइंग टीम की कमान किसने संभाली, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया है। क्या किसी अधिकारी को लिखित रूप से अधिकृत किया गया था? या फिर पूरा खेल मौखिक आदेशों और ‘अनौपचारिक सेटअप’ के भरोसे चल रहा था? यदि लिखित आदेश नहीं हैं, तो यह सीधे-सीधे नियमों की अनदेखी और जिम्मेदारी से बचने का संकेत माना जाएगा।
लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट अब तबादले की तेज होती कवायद है। कार्रवाई के बाद से ही राजेंद्र साहू का नाम लगातार तबादले की चर्चाओं में बना हुआ है। जबलपुर से भोपाल और ग्वालियर तक अधिकारियों से संपर्क, मुलाकातें और प्रयास—इन सबने एक ही सवाल को जन्म दिया है:
क्या यह महज संयोग है, या फिर जांच से पहले ‘सेफ एग्जिट’ की तैयारी?
प्रशासनिक और कानूनी हलकों में यह बात साफ कही जा रही है कि किसी भी संवेदनशील जांच के दौरान संबंधित अधिकारी का तबादला जांच को प्रभावित कर सकता है। कई बार यह प्रक्रिया सबूतों की कड़ी को कमजोर कर देती है और जवाबदेही तय करने में बाधा बनती है। ऐसे में यदि जांच से पहले तबादला होता है, तो यह पूरे मामले को संदिग्ध बना देता है।
लोकायुक्त की कार्रवाई में आरक्षक श्वेता अहिरवार और प्राइवेट कर्मचारी मोहित साहू के कथित रूप से रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद से यह मामला लगातार सुर्खियों में है। इससे यह भी उजागर हुआ कि फ्लाइंग टीम में प्राइवेट लोगों की भूमिका कितनी गहरी हो सकती है। अब सवाल यह है कि क्या यह सब बिना शीर्ष स्तर की जानकारी के संभव था?
अब पूरा मामला तीन धारदार सवालों पर टिक गया है—
लोकायुक्त छापे के वक्त प्रभारी की लोकेशन क्या थी?
उनकी अनुपस्थिति में टीम किसके लिखित आदेश पर चल रही थी?
और क्या तबादले की आड़ में जिम्मेदारी से बचने का रास्ता तैयार किया जा रहा है?
यदि इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और तथ्यों के साथ सामने नहीं आता, तो यह मामला सिर्फ एक विभागीय घोटाले तक सीमित नहीं रहेगा—यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर गहरा दाग बन सकता है।
जबलपुर का फ्लाइंग कांड अब एक केस नहीं, बल्कि एक कसौटी है—जहां तय होगा कि सिस्टम सच के साथ खड़ा है या फिर ‘तबादले’ के रास्ते सच को दबाने की कोशिश की जा रही है।
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