Justice DD Bansal ने जो किया है शायद आज के दिन ऐसा करना लोग अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं। मगर जस्टिस डीडी बंसल ने दुनिया को दिखा दिया है कि यदि देश का प्रधानमंत्री अपील कर रहा है तो उस पर अमल किया जाना चाहिए। जस्टिस डीडी बंसल अमल करके दिखाया और तमाम लोगों को पेट्रोल-़़डीजल बचाने का एक उदाहरण भी पेश किया। जस्टिस बंसल ने अपनी सरकारी कार और वीआईपी ताम-झाम को किनारे रखकर साइकिल से हाई कोर्ट आने-जाने का साहसिक और प्रेरणादायी निर्णय लिया है। हालांकि जिन लोगों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस अपील का सबसे ज्यादा असर दिखना चाहिए था वो आज भी लंबा-चौड़ा काफिला लेकर ऑफिस आते-जाते और शेखी बघारते दिखाई दे रहे हैं।
संकट की घड़ी में कर्तव्य बोध
दरअसल, ईरान और अमेरिका के जंग का असर का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देश से तेल की बचत का आह्वान किया, तो इसका सबसे प्रभावी जवाब न्यायपालिका के गलियारों से आया। जस्टिस डीडी बंसल ने महसूस किया कि केवल उपदेश देने से बेहतर है कि स्वयं आचरण कर समाज को राह दिखाई जाए।
जबलपुर स्थित सिविल लाइंस के पचपेढ़ी स्थित अपने सरकारी आवास से जब जस्टिस बंसल साइकिल पर सवार होकर निकले, तो उनके इस सादगीपूर्ण अंदाज ने सबको चौंका दिया। करीब 3 किलोमीटर का सफर तय कर जब वे हाई कोर्ट पहुंचे, तो यह संदेश स्पष्ट था—देश हित में कोई भी पद सादगी के आड़े नहीं आता।
चीफ जस्टिस की प्रेरणा और सामूहिक प्रयास
जस्टिस बंसल ने अपनी इस पहल का श्रेय मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की प्रेरणा को भी दिया। उन्होंने बताया कि मुख्य न्यायाधीश के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन ने उन्हें पर्यावरण और ऊर्जा संरक्षण की दिशा में यह कदम उठाने का संबल प्रदान किया।
अकेले जस्टिस बंसल ही नहीं, बल्कि उनके इस मिशन में उनके कर्मचारी भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े दिखे। न्यायाधीश की साइकिल के साथ उनका स्टाफ भी अपना जरूरी सामान, बैग और टिफिन लेकर साइकिल पर ही कोर्ट पहुंचा। यह दृश्य बताता है कि जब नेतृत्व स्वयं जमीन पर उतरता है, तो पूरा तंत्र एक सकारात्मक बदलाव की ओर अग्रसर होता है।
गरिमा का अर्थ ताम-झाम नहीं
अमूमन यह माना जाता है कि उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों का साइकिल से चलना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है, लेकिन जस्टिस बंसल ने इस मिथक को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा- यह सोचना पूरी तरह से गलत है कि हाई कोर्ट का जज होकर साइकिल से नहीं जा सकते। पद की मर्यादा काम और न्याय के प्रति समर्पण से होती है, न कि गाड़ियों के काफिले से। वर्तमान परिस्थितियों में जहां तक संभव हो, हम सबको तेल की बचत करनी चाहिए।”
हर आम और खास के लिए बड़ी सीख
जस्टिस बंसल की यह यात्रा केवल उनके घर से कोर्ट तक की दूरी नहीं थी, बल्कि यह जबलपुर की भीड़भाड़ भरी सड़कों पर आम नागरिकों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ थी। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएं और छोटी दूरियों के लिए वाहनों का उपयोग बंद करें।
जस्टिस बंसल की पहल का संदेश
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राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था: विदेशी मुद्रा और ईंधन पर निर्भरता कम करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
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पर्यावरण संरक्षण: साइकिल चलाने से न केवल तेल बचता है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है।
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वीआईपी कल्चर पर चोट: सादगी ही वह असली आभूषण है जो किसी भी उच्च पद की शोभा बढ़ाता है।
बदलाव की शुरुआत
जस्टिस डीडी बंसल का साइकिल से कोर्ट पहुंचना यह सिद्ध करता है कि प्रधानमंत्री की अपील केवल एक राजनैतिक वक्तव्य नहीं है, बल्कि वह एक राष्ट्रीय संकल्प है जिसे न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग भी अपना रहे हैं। जब देश के रक्षक और न्याय के संवाहक स्वयं त्याग की राह चुनते हैं, तो वह पूरे राष्ट्र के लिए एक आंदोलन बन जाता है।
जबलपुर की सड़कों पर न्यायाधीश के साइकिल के पहियों की गूंज आने वाले समय में ऊर्जा संरक्षण के एक नए अध्याय की शुरुआत है।
