Trinamool Congress पश्चिम बंगाल और देश की राजनीति में इस वक्त का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित राजनैतिक घटनाक्रम सामने आया है। Trinamool Congress के संसदीय दल में एक ऐसी ऐतिहासिक बगावत हो चुकी है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर सांगठनिक बदलावों की कोशिशों के बीच, पार्टी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने पूरी तरह से अलग होकर अपना एक स्वतंत्र गुट बना लिया है।
इस घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल के राजनैतिक गलियारों में मूल पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ एक सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। बागी गुट ने रविवार शाम को दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और बंगाली-समर्थक तथा त्रिपुरा की क्षेत्रीय पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने विलय की आधिकारिक घोषणा कर दी।
17 सांसदों ने की स्पीकर से मुलाकात
रविवार शाम को नई दिल्ली में उस वक्त राजनैतिक पारा अत्यधिक बढ़ गया जब Trinamool Congress के वरिष्ठ बागी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय और काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 17 लोकसभा सांसद सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के आवास पर पहुंचे। सांसदों ने स्पीकर को एक पत्र सौंपकर संसद के आगामी सत्र में टीएमसी के मूल सांसदों की बेंच से अलग बैठने के लिए विशेष सिटिंग अरेंजमेंट की मांग की है।
जानकारों की मानें तो इस बड़े विद्रोह की पटकथा काफी समय से लिखी जा रही थी, जिससे पार्टी के भीतर पुराने और जमीनी नेताओं में आंतरिक सांगठनिक फैसलों को लेकर भारी असंतोष पनप रहा था। स्पीकर से इस मुलाकात से ठीक पहले बागी गुट के तमाम सांसदों ने पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रभारी और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ एक लंबी गोपनीय बैठक भी की थी, जिससे इस बगावत के पीछे के रणनीतिक गठजोड़ का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है। इस टूट ने संसद के भीतर Trinamool Congress की मुख्य विपक्षी ताकत को सीधा और गहरा आघात पहुंचाया है।
Rebel TMC MPs met Lok Sabha Speaker Om Birla at his residence, in Delhi today
After meeting him, Rebel TMC MP Kakoli Ghosh Dastidar said, "We, the twenty MPs elected from the AITC, met the Speaker and submitted a letter requesting to sit separately; these twenty MPs constitute… pic.twitter.com/HTFttYCXdm
— ANI (@ANI) June 14, 2026
एंटी-डिफेक्शन लॉ का पेंच
राजनैतिक विश्लेषकों और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, Trinamool Congress के बागी गुट ने यह कदम बेहद सोची-समझी कानूनी रणनीति के तहत उठाया है। भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य एक साथ अलग होकर किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
संसद में Trinamool Congress के कुल 28 निर्वाचित सदस्य हैं, जिसका दो-तिहाई आंकड़ा 19 सांसदों पर बैठता है। बागी गुट के पास वर्तमान में 20 सांसदों का लिखित और हस्ताक्षरित समर्थन प्राप्त है। बागी गुट के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान स्पष्ट कहा:
“हम तकनीकी और कानूनी रूप से पूरी तरह सुरक्षित हैं। हमने सीधे तौर पर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय की औपचारिकता पूरी की है। कानूनन, जब आप मूल दल के 2/3 सदस्यों के साथ अलग होते हैं, तो आप पहले ही दिन अपनी पुरानी पार्टी के नाम और सिंबल पर दावा नहीं ठोक सकते। आगामी जुलाई महीने में हम चुनाव आयोग और अदालत के समक्ष जाएंगे और इस आधार पर Trinamool Congress के नाम और उसके चुनाव चिह्न ‘जुड़वा फूल’ पर अपना कानूनी दावा पेश करेंगे, क्योंकि असली पार्टी का जनमत हमारे पास है।”
यह आक्रामक रणनीति साफ दर्शाती है कि आगामी दिनों में असली Trinamool Congress कौन है, इसका आंतरिक विवाद अब चुनाव आयोग और देश की सर्वोच्च अदालत के चौखट तक पहुंचने वाला है।
त्रिपुरा की क्षेत्रीय पार्टी NCPI का सहारा क्यों?
Trinamool Congress के बागी गुट ने जिस नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में अपना विलय किया है, वह त्रिपुरा राज्य की एक छोटी लेकिन भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में बकायदा रजिस्टर्ड राजनैतिक पार्टी है। हालांकि, वर्तमान में इसे राष्ट्रीय या प्रांतीय स्तर की मान्यता प्राप्त दल का दर्जा हासिल नहीं है।
इस पार्टी का मुख्य एजेंडा पूर्वोत्तर राज्यों में बंगाली समुदाय के हितों की रक्षा और क्षेत्रीय विकास से जुड़ा रहा है। बागी सांसदों द्वारा इस दल को चुनने के पीछे सबसे मुख्य कारण यह है कि इसके जरिए वे बंगाली अस्मिता और पहचान के कार्ड को हाथ से जाने नहीं देना चाहते, जिसे Trinamool Congress अक्सर अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बनाती रही है।
ममता बनर्जी गुट का पलटवार और अभिषेक बनर्जी की घेराबंदी
इस भीषण राजनैतिक संकट और पार्टी के भीतर उठे विद्रोह के तुरंत बाद ममता बनर्जी के खेमे में भी आपातकालीन बैठकें शुरू हो गई हैं। Trinamool Congress के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस संकट को भांपते हुए तुरंत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक कड़ा आधिकारिक पत्र भेजा है। इस पत्र में उन्होंने मांग की है कि इस तथाकथित बागी गुट को संसद के भीतर किसी भी प्रकार की अलग कानूनी मान्यता न दी जाए और स्वेच्छा से दल छोड़ने के आधार पर इनकी सदस्यता तुरंत रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
ममता गुट के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि हाल ही में पार्टी के आंतरिक सुदृढ़ीकरण के लिए किए गए सांगठनिक फैसलों से जिन लोगों के निजी राजनैतिक हित प्रभावित हुए हैं, केवल वही लोग इस तरह के असंवैधानिक और अनैतिक कृत्य में शामिल हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि Trinamool Congress का कैडर और जमीनी मतदाता पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ चट्टान की तरह खड़ा है और सांसदों के जाने से पार्टी कमजोर नहीं होगी।
दिग्गज कानूनी विशेषज्ञों और सीनियर नेताओं की प्रतिक्रियाएं
इस अप्रत्याशित राजनैतिक घटनाक्रम पर देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सिब्बल ने इस विलय की वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा:
“भारतीय लोकतंत्र अब पूरी तरह से एक हास्यास्पद और बेहद चिंतनीय नाटक में तब्दील होता जा रहा है। किसी भी संसदीय दल के बागी सदस्य अपनी व्यक्तिगत इच्छा या क्षमता के आधार पर किसी दूसरी पार्टी में अपनी मर्जी से विलय की घोषणा नहीं कर सकते, जब तक कि वह मूल राजनैतिक दल सामूहिक रूप से ऐसा कोई फैसला न करे। Trinamool Congress के इन बागी सांसदों का यह कदम कानूनी रूप से पूरी तरह अवैध और शून्य है, इन सभी को तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।”
दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल विधानसभा में Trinamool Congress के फायरब्रांड नेताओं ने भी बागी सांसदों के एनडीए के पाले में जाने की तीखी निंदा की है। उनका कहना है कि ये सभी 20 सांसद निर्दलीय चुनाव जीतकर नहीं आए थे, बल्कि उन्हें पश्चिम बंगाल की जनता ने ममता बनर्जी के चेहरे और भाजपा विरोधी नीतियों के नाम पर वोट देकर जिताया था। उनका इस प्रकार अचानक एनडीए की गोद में बैठ जाना उन लाखों मतदाताओं के साथ सबसे बड़ा और अक्षम्य विश्वासघात है। पार्टी नेताओं ने चेतावनी दी है कि गद्दारी करने वाले इन चेहरों को बंगाल की जनता कभी माफ नहीं करेगी और Trinamool Congress सड़क से संसद तक इसका मुंहतोड़ जवाब देगी।
Trinamool Congress से अलग हुए इन 20 बागी सांसदों की पूरी सूची
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और हालिया सांगठनिक बदलावों से नाराज होकर बगावत का झंडा बुलंद करने वाले सांसदों की प्रामाणिक सूची इस प्रकार है:
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काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) – बागी गुट की प्रमुख रणनीतिकार
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दीपक अधिकारी उर्फ देव (घाटाल) – बंगाली सिनेमा के सुपरस्टार और वरिष्ठ सांसद
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सुदीप बंद्योपाध्याय (कोलकाता उत्तर) – लोकसभा में पूर्व Trinamool Congress संसदीय दल के नेता
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शताब्दी रॉय (बीरभूम) – लोकप्रिय अभिनेत्री और लगातार कई बार की सांसद
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सायोनी घोष (जादवपुर) – पार्टी की पूर्व फायरब्रांड युवा विंग चीफ
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यूसुफ पठान (बहरामपुर) – पूर्व भारतीय cricketer और सांसद
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जून मालिया (मेदिनीपुर) – प्रसिद्ध अभिनेत्री और प्रभावी राजनैतिक चेहरा
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रचना बनर्जी (हुगली) – विख्यात टीवी होस्ट और सांसद
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माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) – ममता बनर्जी के सबसे करीबी गढ़ से सांसद
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पार्थ भौमिक (बैरकपुर) – म.प्र. और बंगाल के औद्योगिक बेल्ट के बड़े नेता
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जगदीश चंद्र बसुनिया (कूचबिहार) – Trinamool Congress के उत्तर बंगाल के प्रमुख नेता
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कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) – आदिवासी बेल्ट का बड़ा चेहरा
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खलीलुर रहमान (जांगीपुर) – अल्पसंख्यक समुदाय के प्रभावी नेता
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अरूप चक्रवर्ती (बांकुड़ा)
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अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद)
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डॉ. शर्मिला सरकार (बर्धमान पूर्व)
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प्रसून बंधोपाध्याय (हावड़ा) – पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर और सांसद
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बापी हलदार (मथुरापुर)
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असित कुमार माल (बोलपुर)
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मिताली बाग (आरामबाग)
पूरी तरह बदल गई प.बंगाल की राजनीति
इस भारी उठापटक और आंतरिक टूट के बाद उत्पन्न हुए इस अभूतपूर्व संकट से यह साफ है कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की आंतरिक राजनीति पूरी तरह बदलने वाली है। यदि चुनाव आयोग और लोकसभा अध्यक्ष इस बागी गुट के विलय को पूर्ण कानूनी मान्यता दे देते हैं, तो संसद के भीतर Trinamool Congress की ताकत बेहद कमजोर हो जाएगी।
इसके साथ ही केंद्र की एनडीए सरकार को संसद के निचले सदन में एक बहुत बड़ा और मजबूत बंगाली प्रतिनिधित्व वाला सहयोगी मिल जाएगा, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का गठबंधन ‘इंडिया’ भी पूरी तरह से बैकफुट पर आ जाएगा। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अगले संवैधानिक कदम और चुनाव आयोग के कानूनी रुख पर टिकी हुई हैं कि वे Trinamool Congress के इस सबसे बड़े विभाजन को किस रूप में स्वीकार करते हैं।
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विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के साथ ही बागियों ने बना लिया था अलग गुट
