Adani case in US भारतीय अरबपति गौतम अडानी और उनके सहयोगियों से जुड़े विवादित मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने हाल ही में एक संघीय न्यायाधीश के समक्ष 10 पन्नों का विस्तृत जवाब दाखिल करते हुए इस मामले को वापस लेने के अपने फैसले का पुरजोर बचाव किया है। विभाग का कहना है कि यह मुकदमा न केवल कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था, बल्कि कूटनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत अनुचित था।
मुकदमा कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था
DOJ ने अपनी फाइलिंग में तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि Adani case in US को एक साल पहले ही बंद हो जाना चाहिए था। विभाग ने अपनी दलील में स्पष्ट किया, “यह मुकदमा तो कभी शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था।” विभाग का यह आक्रामक रुख अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज निकोलस गारौफिस द्वारा उठाई गई आपत्तियों के बाद सामने आया है। जज गारौफिस ने न्याय विभाग की पूर्ववर्ती दलीलों को “अस्पष्ट” बताते हुए मामले को स्थायी रूप से बंद करने के कारणों पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा था।
ट्रम्प प्रशासन की प्राथमिकताएं और कानूनी आधार
न्याय विभाग ने अपनी फाइलिंग में यह संकेत दिया है कि यह कानूनी कार्रवाई ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान प्रवर्तन प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं थी। DOJ ने यह तर्क भी दिया है कि आरोपों को स्थायी रूप से खारिज करने के उनके प्रशासनिक निर्णय में न्यायालय की समीक्षा की भूमिका अत्यंत सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि Adani case in US का यह रुख अमेरिकी न्याय प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच के जटिल संबंधों को उजागर करता है।
क्या था पूरा मामला
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आरोपों की पृष्ठभूमि: 2024 में बाइडेन प्रशासन के दौरान, DOJ ने इस Adani case in US के तहत अडानी और उनके सहयोगियों पर भारतीय सरकारी अधिकारियों को 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने का आरोप लगाया था।
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निवेशकों के साथ धोखाधड़ी: अभियोजन पक्ष का दावा था कि इस रिश्वत के जरिए अरबों डॉलर का निवेश हासिल किया गया, जिसमें अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड द्वारा अमेरिकी निवेशकों से जुटाए गए कम से कम 17.5 करोड़ डॉलर शामिल थे।
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मौजूदा स्थिति: अब न्याय विभाग इस Adani case in US को कानूनी रूप से पूरी तरह समाप्त करने की प्रक्रिया में है।
कानूनी और कूटनीतिक प्रभाव
कानूनी जानकारों के अनुसार, Adani case in US का यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जगत के लिए एक बड़ा सबक है। विभाग का स्पष्ट रुख यह दर्शाता है कि भविष्य में विदेशी उद्योगपतियों के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले कूटनीतिक पहलुओं को प्राथमिकता दी जाएगी। Adani case in US के इस मोड़ पर विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित करेगा और भविष्य की कानूनी कार्यवाहियों के लिए मिसाल बनेगा।
विभाग की नवीनतम फाइलिंग ने उन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या Adani case in US वास्तव में राजनीतिक था। न्याय विभाग के वकील अब जोर दे रहे हैं कि अभियोजन पक्ष के पास सबूतों का अभाव था और इस मामले को आगे खींचना संसाधनों की बर्बादी थी।
गारोफिस के फैसले पर टिकीं सबकी निगाहें
Adani case in US के संदर्भ में अब सबकी निगाहें जज गारौफिस के अगले फैसले पर टिकी हैं। क्या अदालत न्याय विभाग की इस दलील को स्वीकार करेगी? यह देखना बाकी है। स्पष्ट रूप से, Adani case in US का यह अध्याय न केवल कानूनी हलकों में, बल्कि वैश्विक मीडिया में भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन का यह कदम यह साबित करता है कि वे अब इस मामले को पूरी तरह दफन कर देना चाहते हैं, ताकि भविष्य में कोई कूटनीतिक अड़चन न आए।
21 नवंबर 2024 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया था। उन्होंने कहा था, अमेरिका की जांच में यह साबित हो चुका है कि अडानी ने भारतीय और अमेरिकी दोनों कानूनों को तोड़ा है। गौतम अडानी को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री उन्हें बचा रहे हैं क्योंकि वे उनके साथ खड़े हैं।
संजय सिंह (आम आदमी पार्टी): ‘आप’ के नेताओं ने भी इस मामले में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान जमकर हंगामा किया था।संजय सिंह ने कहा था कि जब एक विदेशी जांच एजेंसी भारत के किसी उद्योगपति पर इतने गंभीर आरोप लगा रही है, तो भारतीय एजेंसियां (ED और CBI) मूकदर्शक क्यों बनी हुई हैं?
महुआ मोइत्रा (तृणमूल कांग्रेस): टीएमसी की फायरब्रांड नेता ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस अमेरिकी आरोप पत्र को “अडानी साम्राज्य के अंत की शुरुआत” करार दिया था। उन्होंने सेबी (SEBI) और केंद्र सरकार पर अडानी समूह के कथित घोटालों पर पर्दा डालने का आरोप लगाया था।
Adani Case in US पर कांग्रेस सहित विपक्ष ने पांच दिन तक नहीं चलने दी थी संसद!
नवंबर 2024 में अमेरिका में गौतम अडानी पर लगे कथित रिश्वत और धोखाधड़ी के आरोपों (Adani Case in US) को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र 2024 (25 नवंबर – 20 दिसंबर 2024) में विपक्ष के हंगामे के कारण शुरुआती लगातार 5 कार्य दिवसों (Working Days) तक संसद की कार्यवाही पूरी तरह ठप रही थी। [
विपक्ष इस मुद्दे (Adani Case in US) पर नियम 267 के तहत तत्काल जेपीसी (JPC) जांच और चर्चा की मांग पर अड़ा हुआ था। इसके बाद भी पूरे सत्र के दौरान बीच-बीच में व्यवधान आता रहा, जिसके चलते पूरे सत्र में निर्धारित समय के मुकाबले सिर्फ आधा कामकाज (लगभग 50% फंक्शनिंग) ही हो सका था।
- 25 नवंबर 2024 (पहला दिन): सत्र की शुरुआत होते ही विपक्षी सांसदों ने अमेरिकी अदालत के आरोपों को लेकर भारी हंगामा किया, जिससे दोनों सदन (लोकसभा और राज्यसभा) दिनभर के लिए स्थगित कर दिए गए।
- 26 नवंबर 2024: संविधान दिवस की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में संसद सत्र की छुट्टी थी।
- 27 और 28 नवंबर 2024 (दूसरा और तीसरा कार्य दिवस): अडानी रिश्वत मामले और संभल-मणिपुर हिंसा जैसे मुद्दों पर चर्चा की मांग को लेकर कार्यवाही लगातार बाधित और स्थगित होती रही।
- 29 नवंबर 2024 (चौथा कार्य दिवस): विपक्ष के जोरदार नारों और विरोध के कारण चौथे सीधे दिन भी दोनों सदनों को बिना किसी विशेष कामकाज के सोमवार तक के लिए स्थगित करना पड़ा।
- 2 दिसंबर 2024 (पांचवां कार्य दिवस): लगातार पांचवें दिन भी सदन की कार्यवाही शुरू होते ही वेल में आकर विपक्ष ने नारेबाजी की, जिसके चलते लोकसभा और राज्यसभा को फिर से स्थगित कर दिया गया।
लोकसभा अध्यक्ष की सर्वदलीय बैठक (सर्वसम्मति)
- अध्यक्ष की पहल: Adani case in US पर लगातार 5 दिनों के हंगामे के बाद, 2 दिसंबर 2024 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद भवन में सभी राजनीतिक दलों के फ्लोर लीडर्स की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई।
- दलों की सहमति: इस बैठक में कांग्रेस (गौरव गोगोई), टीएमसी (कल्याण बनर्जी), सपा (धर्मेंद्र यादव) समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि सदन को सुचारू रूप से चलने दिया जाएगा और विपक्ष सदन की मर्यादा के भीतर (Adani case in US) पर अपनी बात रखेगा।
‘संविधान की 75वीं वर्षगांठ‘ पर चर्चा का प्रस्ताव
- बीच का रास्ता: सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध तब टूटा जब सरकार कांग्रेस और अन्य दलों की इस मांग पर सहमत हो गई कि संविधान की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में दोनों सदनों में एक विशेष और विस्तृत चर्चा आयोजित की जाए। विपक्ष इस पर राजी हो गया और इसके बाद ही सामान्य कामकाज शुरू हो सका। दरअसल, समाजवादी पार्टी और तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस भी इस मुद्दे (Adani case in US) पर लगातार संसद को बंधक बनाकर नहीं चाहती थी। इसलिए बीच का रास्ता निकला जा सका।
Adani Case in US पर अब क्या करेंगे विपक्षी नेता
अमेरिकी न्याय विभाग की इस हालिया और अंतिम टिप्पणी ने पूरे घटनाक्रम का पासा पलट दिया है। विभाग ने अदालती दस्तावेज में साफ लिखा है कि कथित आचरण मुख्य रूप से भारत का आंतरिक मामला था, इसमें किसी अमेरिकी कंपनी को कोई नुकसान नहीं हुआ, और न ही इससे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई आंच आई।
अडानी के आलोचकों, जिन्होंने एक विदेशी एजेंसी की अधकचरी रिपोर्ट को ‘परम सत्य’ मानकर देश के प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले किए थे और देश की संसद को हफ्तों तक ठप रखा था, उनके पास अब कोई नैतिक आधार नहीं बचा है। अमेरिकी कानून व्यवस्था द्वारा खुद इस मामले को “दुर्भावनापूर्ण और आधारहीन” मानकर बंद करने की वकालत के बाद, देश की छवि धूमिल करने वाले इन नेताओं के दावों पर एक बड़ा कानूनी और कूटनीतिक तमाचा लगा है।

21 नवंबर 2024 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में
संजय सिंह (आम आदमी पार्टी): ‘आप’ के नेताओं ने भी इस मामले में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान जमकर हंगामा किया था।संजय सिंह ने कहा था कि जब एक विदेशी जांच एजेंसी भारत के किसी उद्योगपति पर इतने गंभीर आरोप लगा रही है, तो भारतीय एजेंसियां (ED और CBI) मूकदर्शक क्यों बनी हुई हैं? 