Operation Tiger महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय जो सबसे बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ आया है, उसने पूरे सियासी समीकरण को हिलाकर रख दिया है। अधिकृत मीडिया इनपुट्स और हालिया प्रेस वार्ताओं के विश्लेषण से एक बेहद चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। दरअसल, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) के सांसदों की इस अभूतपूर्व जल्दबाजी के पीछे सिर्फ शिंदे गुट का दबाव ही नहीं, बल्कि संजय राउत का वह बयान भी है जिसमें उन्होंने क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस में विलय करने की वकालत की है।
संजय राउत के इस रुख के बाद उद्धव गुट के सांसदों में वैचारिक असुरक्षा और तेज हो गई है, क्योंकि बालासाहेब ठाकरे की विरासत को मानने वाले नेता खुद को कांग्रेस के छाते के नीचे सहज नहीं पा रहे हैं।
Operation Tiger: क्या कांग्रेस में विलय की आशंका से मची है उद्धव गुट में भगदड़?
शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) के लोकसभा सांसदों के पाला बदलने की खबरें देश की सबसे बड़ी राजनीतिक सुर्खियां बन चुकी हैं। राजनीतिक और मीडिया हलकों में इस दलबदल अभियान को Operation Tiger का नाम दिया गया है, जिसे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के नेतृत्व वाली शिवसेना द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।
मातोश्री पर बुलाई गई आपात बैठक से कई सांसदों की दूरी पर शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने बेहद तल्ख और हताश लहजे में कहा—“जिसको जाना है, वो प्यार से जाए।” इस गंभीर राजनीतिक मोड़ पर पत्रकारिता के निष्पक्ष दृष्टिकोण से यह समझना आवश्यक है कि आखिर इस Operation Tiger के पीछे पर्दे के पीछे कौन से समीकरण काम कर रहे हैं और सांसद अचानक ‘मातोश्री’ छोड़ने की इतनी जल्दबाजी में क्यों हैं।
दिल्ली में संजय राउत की प्रेस कॉन्फ्रेंस और 6 सांसदों की अनुपस्थिति
Operation Tiger नाकाम होने की आशा लिए बुधवार को दिल्ली में शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत के आवास पर एक बेहद महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य पार्टी की एकजुटता दिखाना था, लेकिन नतीजों ने इसके उलट उद्धव गुट की कमजोरी को जगजाहिर कर दिया। Operation Tiger संजय राउत की लाख कोशिशों के बावजूद Operation Tiger कामयाब होता दिखाई दिया।
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केवल 3 सांसदों की उपस्थिति: इस प्रेस वार्ता में संजय राउत के साथ लोकसभा नेता अरविंद सावंत, चीफ व्हिप अनिल देसाई और नासिक के सांसद राजाभाऊ वाजे ही पहुंचे।
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6 सांसदों की बड़ी दूरी: शिवसेना UBT के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से शेष 6 सांसद इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पूरी तरह नदारद रहे।
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बगावत पर लगी मुहर: राजनीतिक गलियारों में इस बात को तय माना जा रहा है कि दिल्ली पहुंचे ये 6 बागी सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना (शिंदे गुट) के साथ जाने की अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे रहे हैं और मुख्यमंत्री शिंदे के इस Operation Tiger ने उद्धव गुट को संसदीय स्तर पर बड़ा झटका दे दिया है।
गुरुवार को संसदीय बोर्ड की बैठक और व्हिप जारी
Operation Tiger को रोकने के मकसद से राउत ने एक चाल और चली है। राउत ने घोषणा की है कि शिवसेना (UBT) ने गुरुवार को अपने संसदीय बोर्ड की एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। इस बैठक के लिए सभी सांसदों को अनिवार्य रूप से उपस्थित होने का सख्त ‘व्हिप’ जारी किया गया है। राउत ने कहा, “गुरुवार की बैठक के बाद हम देखेंगे कि आगे क्या कानूनी और राजनीतिक कदम उठाया जाना है।”
#WATCH | Delhi | Amid speculations of a split in Shiv Sena UBT, party MP Sanjay Raut says, "I have information that Rs 15 crore each was delivered to the MPs, after which they boarded charter flights from three places, including Nanded and Pune. We have issued a whip for the… pic.twitter.com/s50XxiJV3E
— ANI (@ANI) June 17, 2026
दलबदल विरोधी कानून का गणित और लोकसभा स्पीकर से बागी सांसदों की मुलाकात
उधर, दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, Operation Tiger के तहत उन 6 बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से संपर्क साध लिया है। सूत्रों का दावा है कि इन 6 सांसदों ने स्पीकर से मिलकर सदन में एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए औपचारिक निवेदन (Petition) भी कर दिया है।
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अनुसार, किसी भी कानूनी कार्रवाई या अयोग्यता (Disqualification) से बचने के लिए मूल पार्टी से अलग होने वाले धड़े के पास कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्यों का होना अनिवार्य है। वर्तमान में लोकसभा में शिवसेना (UBT) के कुल 9 सांसद हैं। 9 का दो-तिहाई आंकड़ा सटीक रूप से 6 बैठता है। यही वजह है कि बागी सांसद 6 का आंकड़ा पूरा होते ही तुरंत स्पीकर से मुलाकात कर रहे हैं, ताकि शिंदे गुट का यह Operation Tiger कानूनी रूप से पूरी तरह सुरक्षित और सफल हो सके।
Operation Tiger और सांसदों की जल्दबाजी के पीछे 4 बड़े कारण
एकनाथ शिंदे गुट के वरिष्ठ नेताओं के दावों के अनुसार, Operation Tiger अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और 19 जून की समयसीमा बेहद अहम मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों और अधिकृत मीडिया इनपुट्स (ANI) के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस पूरे Operation Tiger की सफलता और सांसदों की छटपटाहट के पीछे निम्नलिखित 4 मुख्य कारण काम कर रहे हैं:
संजय राउत का बयान और कांग्रेस में विलय की आशंका का डर
इस बगावत को हवा देने Operation Tiger को कामयाब की ओर बढ़ाने वाला सबसे बड़ा और हालिया कारण संजय राउत का वह बयान है, जिसमें उन्होंने देश के क्षेत्रीय दलों (जैसे TMC और NCP-SP) को भाजपा से लड़ने के लिए अपनी पैरेंट पार्टी यानी कांग्रेस में विलय करने की सलाह दी है। हालांकि राउत ने इसे विपक्ष को मजबूत करने की बात कहा, लेकिन उद्धव गुट के सांसदों के बीच यह संदेश गया कि भविष्य में शिवसेना (UBT) का वजूद भी कांग्रेस में विलीन हो सकता है।
कट्टर हिंदुत्व और बालासाहेब ठाकरे की ‘कांग्रेस विरोधी’ विचारधारा पर राजनीति करने वाले इन सांसदों को अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर दिखाई दे रहा है। उन्हें डर है कि यदि वे कांग्रेस के साथ पूरी तरह मर्ज हो गए, तो महाराष्ट्र की जनता के बीच उनका आधार खत्म हो जाएगा। इसी डर के कारण वे शिंदे गुट के Operation Tiger को एक सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस आलाकमान के सामने शर्त रखी है कि यदि उन्हें महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष का पद का पक्का आश्वासन दिया जाए तो वो अपने सांसदों के साथ कांग्रेस में विलय कर सकते हैं। हालांकि, इस बारे में कांग्रेस या उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कोई बयान या स्पष्टिकरण नहीं आया है। हां, यह जरूर कहा जा रहा है उद्धव के अधिकांश सांसद संजय राउत के इस साजिश से नाराज हैं इसीलिए एकनाथ शिंदे का Operation Tiger सफल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यही वजह है कि बागी सांसद एक साथ मिलकर 6 या 7 की संख्या पूरी करने की जल्दबाजी में हैं, ताकि वे सीधे बिना किसी कानूनी अड़चन के लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ संसदीय दल का विलय कर सकें। शिंदे गुट अपने इस Operation Tiger को इसी कानूनी आंकड़े के तहत अंजाम दे रहा है।
निर्वाचन क्षेत्रों के लिए भारी-भरकम विकास फंड और केंद्रीय बजट का आश्वासन
महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि जो सांसद पाला बदलने की तैयारी में हैं, उन्हें अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, सड़कों और विकास परियोजनाओं के लिए करोड़ों रुपये के विशेष बजटीय आवंटन का भरोसा दिया गया है। सांसदों को यह भली-भांति पता है कि विपक्ष में रहते हुए उन्हें अपने क्षेत्रों के लिए फंड जुटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, जिससे 2029 के आगामी चुनावों में उनका राजनीतिक वजूद खतरे में पड़ सकता है। शिंदे गुट का यह Operation Tiger सांसदों को सत्ता की ताकत और सीधे सरकारी फंड तक पहुंच का मजबूत विकल्प दे रहा है।
महाविकास अघाड़ी में आंतरिक कलह और सीटों का गणित
ठाकरे गुट के कई सांसद कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के साथ महाविकास अघाड़ी गठबंधन में सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर जारी खींचतान और वैचारिक मतभेदों के कारण इन सांसदों को अपना भविष्य असुरक्षित दिखाई दे रहा है। उन्हें लगता है कि मूल बालासाहेब ठाकरे की हिंदुत्ववादी विचारधारा और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने के लिए भाजपा-शिंदे गठबंधन (NDA) का हिस्सा बनना अधिक तार्किक और सुरक्षित मार्ग है। यही वजह है कि वे शिंदे गुट के Operation Tiger की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
उद्धव ठाकरे का बयान: ‘जिसको जाना है प्यार से जाए’ के गहरे राजनीतिक मायने
सांसदों के दिल्ली पहुंचने और मातोश्री की बैठक में केवल 4 सांसदों की उपस्थिति (शेष 5 के ऑनलाइन जुड़ने के दावों) के बाद उद्धव ठाकरे ने अपने बचे हुए विधायकों और पदाधिकारियों के साथ आपात बैठक की। इस बैठक में उन्होंने बगावत करने वालों को रोकने के बजाय बेहद आक्रामक और भावनात्मक रुख अपनाया।
उद्धव ठाकरे का रुख: “आज मेरा दिन नहीं है, लेकिन कल मेरा दिन जरूर आएगा। तब तक हमें सब कुछ सहना होगा। जिसे जाना है, वो प्यार से जाए, उसका भला हो। जिन लोगों ने पार्टी के साथ गद्दारी की है, उन्हें जनता सबक सिखाएगी।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उद्धव ठाकरे का यह बयान एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वह 2022 की तरह एक बार फिर महाराष्ट्र की जनता के बीच विक्टिम कार्ड (Victim Card) और सहानुभूति हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि शिंदे गुट के Operation Tiger के असर को कम किया जा सके।
हालांकि, कानूनी मोर्चे पर डैमेज कंट्रोल करते हुए यूबीटी के संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने तुरंत लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर मांग की है कि किसी भी बागी गुट को अलग मान्यता न दी जाए, क्योंकि विधायी दल का वजूद मूल राजनैतिक दल से अलग नहीं हो सकता।
संजय राउत के ₹15 करोड़ के आरोप और विपक्षी नेताओं का पलटवार
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर एक बेहद सनसनीखेज दावा किया। राउत ने लिखा कि महाराष्ट्र के सांसदों को पाला बदलने के लिए ₹15-15 करोड़ की एडवांस राशि ऑफर की जा रही है, जिसे उन्होंने “अपना सपना मनी मनी” करार दिया। कांग्रेस नेता नाना पटोले ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे Operation Tiger के बजाय ‘ऑपरेशन गीदड़’ (Operation Jackal) कहा और आरोप लगाया कि बीजेपी सत्ता की भूख में लोकतांत्रिक मर्यादाएं लांघ रही है।
इसके जवाब में शिंदे गुट और भाजपा के मंत्रियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। शिंदे गुट के प्रवक्ताओं का कहना है कि उद्धव ठाकरे और संजय राउत खुद अपनी पार्टी को वैचारिक रूप से कांग्रेस के हाथों गिरवी रख रहे हैं, जिससे उनके अपने सांसद नाराज हैं। सांसद किसी दबाव या पैसे के लालच में नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के विकास कार्यों और जमीनी पकड़ से प्रभावित होकर स्वतः ही उनके साथ जुड़ रहे हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति से बाहर हो जाएँगे उद्धव?
इस Operation Tiger के इस अंतिम चरण में यदि 6 या 7 सांसद आधिकारिक रूप से एकनाथ शिंदे की शिवसेना का दामन थाम लेते हैं, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए अब तक का सबसे बड़ा संसदीय झटका होगा। संजय राउत द्वारा विपक्षी दलों को कांग्रेस में मिलाने की वकालत और उस पर पार्टी के भीतर उठी असंतोष की चिंगारी ने आग में घी का काम किया है।
फिलहाल, 19 जून की समयसीमा और लोकसभा अध्यक्ष के अगले रुख पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं कि क्या यह Operation Tiger वाकई सफल हो पाता है या ठाकरे डैमेज कंट्रोल करने में कामयाब होते हैं।
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