ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के हाथों से न केवल पार्टी का नियंत्रण निकल चुका है बल्कि पार्टी के नाम लगभग पांच सौ करोड़ की संपत्तियों से भी ममता बनर्जी को हाथ धोने की नौैबत आ चुकी है। इसीलिए ममता बनर्जी अब यह चाहती हैं किसी भी तरह अपना अस्तित्व बचा कर रखा जाए और कम से कम पांच सौ करोड़ की संपत्ति तो बचाई जा सके।
ऐसा बताया जाता है कि कांग्रेस में विलय के लिए ममता ने शर्त रखी थी कि वो पांच सौ करोड़ की संपत्ति ट्रांसफर करने के एवज में एलओपी का पद चाहती हैं। मगर कांग्रेस ने कहा कि पांच सौ करोड़ रुपये उनके लिए कुछ महत्व नहीं रखते हैं। अगर ममता विलय चाहती हैं तो पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद उन्हें दिया जा सकता है और अभिषेक को महामंत्री का पद दिया जाएगा। दोनों को कांग्रेस वर्किंग कमेटी में भी स्थान दिया जाएगा।
ममता को कांग्रेस का यह प्रस्ताव मंजूर नहीं था, लिहाजा 10 जून की मध्यरात्रि में कांग्रेस ने जयराम रमेश के सोशल मीडिया से एक संदेश प्रस्तारित करवाया कि तृणमूल और इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय की खबरें महज अफवाह हैं।
हालांकि इससे दो बार ममता और सोनिया की मुलाकात और तीन बार अभिषेक-राहुल की मुलाकात पर न तो कांग्रेस की ओर से कोई स्पष्टिकरण आया और तृणमूल कांग्रेस की ओर से। इससे इन बातों को बल मिला कि तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का विलय होने जा रहा है।
पश्चिमी बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय पटल पर एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आ चुका है जिसने क्षेत्रीय क्षत्रपों की तानाशाही और पार्टी पर एकाधिकार को सीधी चुनौती दी है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का यह सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है। 19 TMC MPs Rebel की इस घटना ने न केवल दिल्ली के लुटियंस जोन को हिला दिपनीय पत्र के सामने आने के बाद यह साफ हो चुका है कि तृणमूल कांग्रेस अब विभाजन के उस कगार पर है, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता।
इस पूरी घटनाक्रम का सबसे बड़ा पहलू यह है कि इस बगावत के बाद ममता बनर्जी के सामने अब पार्टी के अस्तित्व को बचाने से ज्यादा अपनी साख और पार्टी के फंड तथा संपत्तियों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि ममता बनर्जी अब पार्टी की विचारधारा से ज्यादा उसकी 500 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्तियों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच खेल रही हैं।
विधानसभा से लोकसभा तक का सफर: कैसे टूटी पार्टी?
तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह असंतोष रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। 19 TMC MPs Rebel की इस कहानी की पटकथा पहले ही कोलकाता की विधानसभा में लिखी जा चुकी थी, जब 64 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करते हुए सदन में एक अलग गुट की मान्यता देने की मांग की थी। विधानसभा में 64 विधायकों का टूटना ममता बनर्जी की राज्य सरकार और सांगठनिक पकड़ के लिए पहला सबसे बड़ा झटका था।
विधायकों की इस बगावत ने दिल्ली में बैठे सांसदों को भी एक संजीवनी दे दी। लोकसभा चुनाव के बाद से ही पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी, भतीजावाद और चुनिंदा नेताओं के एकाधिकार को लेकर असंतोष पनप रहा था। आखिरकार 19 मई को यह असंतोष पूरी तरह से फूट पड़ा। लोकसभा के 19 सांसदों ने एकजुट होकर संसद के निचले सदन यानी लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को एक औपचारिक पत्र सौंपा। इस पत्र में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस के मूल दल से अलग एक स्वतंत्र गुट के रूप में मान्यता दी जाए।
दलबदल कानून (Anti-Defection Law) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए यह संख्या इतनी बड़ी है कि इस पर कानूनी रूप से कार्रवाई करना ममता बनर्जी के खेमे के लिए लगभग असंभव हो गया है।500 करोड़ की संपत्ति का विवाद: अस्तित्व बनाम नियंत्रणराजनीति में जब भी कोई बड़ी पार्टी टूटती है, तो केवल वैचारिक मतभेद ही सामने नहीं आते, बल्कि पार्टी के फंड, बैंक अकाउंट और संपत्तियों पर अधिकार की जंग भी शुरू हो जाती है।
तृणमूल कांग्रेस के इस महाविभाजन में भी यही देखने को मिल रहा है। 19 TMC MPs Rebel के इस बड़े कदम के बाद, पार्टी की अंदरूनी रिपोर्टों से यह बात छनकर बाहर आ रही है कि तृणमूल कांग्रेस के पास इस समय विभिन्न बैंक खातों, चुनावी बांडों, अचल संपत्तियों और क्षेत्रीय कार्यालयों के रूप में लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक का साम्राज्य है। अब जब विधानसभा में 64 विधायक और लोकसभा में 19 सांसद अलग गुट बना चुके हैं, तो तकनीकी और कानूनी रूप से ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ कौन है, इसकी लड़ाई चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंचना तय है।
ममता बनर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि संसदीय दल और विधायी दल में बहुमत खोने के बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न (जोड़ा फूल) उनके हाथ से निकल सकता है। यही कारण है कि उनकी चिंता अब पार्टी के खोते हुए राजनीतिक अस्तित्व से ज्यादा उस 500 करोड़ रुपये की संपत्ति को बचाने पर केंद्रित हो गई है, जिसे उन्होंने पिछले ढाई दशकों में कड़ी मेहनत और चंदे के दम पर खड़ा किया है।
कांग्रेस में विलय की अफवाहों पर पूर्णविरामइस पूरे घटनाक्रम के बीच एक समय यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि ममता बनर्जी अपनी बची-कुची पार्टी को बचाने के लिए और भारतीय जनता पार्टी (BJP) या अन्य विरोधी ताकतों का मुकाबला करने के लिए अपनी पार्टी का विलय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में कर सकती हैं। ममता बनर्जी के पुराने कांग्रेसी बैकग्राउंड को देखते हुए इस थ्योरी को काफी हवा मिली थी।
हालांकि, 19 TMC MPs Rebel के पत्र के सार्वजनिक होने और लोकसभा में एक बड़े धड़े के अलग हो जाने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। कांग्रेस अब एक कमजोर और खंडित नेतृत्व के साथ हाथ मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई गलत संदेश नहीं देना चाहती। दूसरी तरफ, बागी सांसदों और विधायकों के गुट ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर कांग्रेस के झंडे के नीचे नहीं जाएंगे।
इस रुख के बाद तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में विलय की तमाम अटकलों और खबरों पर अब पूरी तरह से विराम लग चुका है। पार्टी पर नियंत्रण खोने के दूरगामी राजनीतिक परिणामममता बनर्जी को भारतीय राजनीति में एक जुझारू और सड़क से उठकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली नेत्री के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन 19 TMC MPs Rebel के इस संकट ने उनकी सांगठनिक क्षमता और निर्णय लेने की शैली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
जब किसी पार्टी के 19 सांसद और 64 विधायक एक साथ बगावत कर दें, तो इसे केवल एक ‘अस्थायी असंतोष’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये और उनके उत्तराधिकारी को लेकर पार्टी के भीतर चल रही जंग का नतीजा है। इस विभाजन के बाद पश्चिमी बंगाल की राजनीति में एक बहुत बड़ा वैक्यूम (शून्य) पैदा हो जाएगा।
19 TMC MPs Rebel की यह घटना केवल तृणमूल कांग्रेस का विभाजन नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक नए युग की शुरुआत और ममता बनर्जी के एकछत्र राज के अवसान का संकेत है। 19 मई को स्पीकर को लिखी गई वह चिट्ठी आने वाले दिनों में भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे बड़े विभाजनों में से एक के रूप में दर्ज की जाएगी।अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग और लोकसभा स्पीकर इस मामले पर क्या कानूनी रुख अपनाते हैं। लेकिन राजनीतिक रूप से यह स्पष्ट हो चुका है कि ममता बनर्जी अब बैकफुट पर हैं। पार्टी के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई अब केवल अदालतों और चुनाव आयोग के दफ्तरों तक सीमित रह गई है, जबकि जमीन पर उनके पैरों के नीचे से राजनीतिक जमीन पूरी तरह खिसक चुकी है। 500 करोड़ की संपत्ति पर नियंत्रण रखने की उनकी यह आखिरी कोशिश क्या रंग लाती है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का वह पुराना स्वरूप अब हमेशा के लिए इतिहास बन चुका है।
