Mamata Banerjee ममता बनर्जी अपनी दोनों सीटों से चुनाव हार गईं। ममता बनर्जी के शासन का पश्चिम बंगाल से अंत हो गया। दोनों सीटें हारने के साथ ममता बनर्जी के सियासी भविष्य पर सवाल लग गया। ममता बनर्जी की हार और तृणमूल शासन के अंत के साथ पश्चिम बंगाल में एक और बड़ा काम हुआ है। वो है पश्चिम बंगाल के इस्लामीकरण पर रोक लग गई है। सुनने में अजीब लगता है पश्चिम बंगाल का इस्लामीकरण जी हां, कैसे इसको आगे बताएंगे। पहले ममता बनर्जी की दोनों सीटों से हार का विश्लेषणः
ममता की शर्मनाक बिदाई
इसे लोकतंत्र का सबसे बड़ा उलटफेर कहिए या ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे शर्मनाक विदाई! जिस ‘दीदी’ ने दिल्ली के सिंहासन को चुनौती देने का दम भरा था, आज वो अपने ही घर में दोनों सीटों से ढेर हो गई हैं। और सबसे बड़ी बात-उन्हें शिकस्त देने वाला कोई नहीं, बल्कि उन्हीं का पुराना सिपहसालार सुवेंदु अधिकारी है।
ममता बनर्जी चारों खाने चित
नंदीग्राम की माटी हो या भवानीपुर का सुरक्षित गलियारा, सुवेंदु ने ममता बनर्जी को चारों खाने चित कर दिया है। ये हार सिर्फ दो सीटों की नहीं है, ये हार उस ‘ईगो’ की है जिसने मान लिया था कि बंगाल की सत्ता पर उनका एकाधिकार है। सुवेंदु ने न केवल जीत दर्ज की है, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक वजूद पर वो चोट की है जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई देगी।
ममता बनर्जी के सियासी करियर का अवसान
भारत की राजनीति में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के लिए यह उनके राजनीतिक करियर का सबसे कठिन दौर है। इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी के सियासी करियर का अवसान हो रहा है। ममता बनर्जी के सियासी उत्तराधिकारी भी चुनाव हार गए हैं। इसलिए अब विधाई राजनीति दोनों के हाथ से निकल चुकी है। हालिया विधानसभा चुनावों के जो परिणाम सामने आए हैं, उन्होंने न केवल तृणमूल कांग्रेस के खेमे में सन्नाटा पसरा दिया है। इन चुनावों ने साबित कर दिया है कि अगर देश के बहुसंख्यक मतदाता कर लें तो 40-45 प्रतिशत एकजुट होने के बाद भी चुनावी परिवर्तन को नहीं रोक सकते ।
नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों जगह से ममता क्यों उतरी मैदान में
ममता बनर्जी पिछले चुनावों में सुवेंदु अधिकारी की हनक देख चुकी थी। नंदीग्राम से पिछली बार भी ममता चुनाव हार गईं थीं। लेकिन भवानीपुर में जीती थी मगर मुश्किल से। इस बार पश्चिम बंगाल में हिंदू राष्ट्रवाद के तूफान की आंधी वो देख रही थी। इसलिए दोनों सीटों से चुनाव मैदान में उतरी। ममता का अनुमान थोड़ा गलत हो गया। भद्रलोक में जागे हिंदूराष्ट्रवाद को जान नहीं पाईं। ममता को भरोसा था कि 30 फीसदी मुसलमान तो उसके साथ है ही, बहुसंख्यकों में से अगर 20 फीसदी का भी वोट मिल गया तो वो आसानी से जीत जाएगी। लेकिन इस बार भद्रलोक ने ममता से ऊपर हिंदू राष्ट्रवाद को स्थान दिया।
इंकमबेंसी और कटमनी ने ममता को हराया
चुनावी पंडित मानते हैं कि ममता बनर्जी की हार के पीछे एंटी इंकमबेंसी और स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और “कट मनी” जैसे आरोपों ने आम जनता के बीच असंतोष पैदा किया। वहीं सुवेंदु न केवल एक कुशल रणनीतिकार हैं, बल्कि उनका सांगठनिक कौशल टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रहा। इसके अलावा चुनावों के दौरान जिस तरह से मुद्दों का ध्रुवीकरण हुआ, उसने साइलेंट वोटर्स को प्रभावित किया। इसके अलावा रोजगार और औद्योगिक विकास की कमी के कारण युवाओं का एक बड़ा वर्ग परिवर्तन की तलाश में दिखा।
दीदी का किला ढह गया
दीदी का किला ढह चुका है तो क्या दीदी के सियासी करियर का अंत भी हो गया। यह बहुत बड़ा सवाल है। दीदी पश्चिम बंगाल की विधाई सियासत से जरूर बाहर हो गई लेकिन तृणमूल की कमान अभी उसी के हाथ में है। वो राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए अब पिछले दरवाजे से राज्यसभा में जाएगी। पहले किसी से इस्तीफा दिलवाएगी और फिर उसकी जगह खुद राज्यसभा में बैठ जाएगी।
सीआईए की एसेट है ममता दीदी!
कुछ हलकों में एक कथित सीआईए की खुफिया रिपोर्ट की कॉपी घूम रही है। इस रिपोर्ट में सीआईए ने अमेरिकी सरकार को सुझाव दिया था कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री रहते अमेरिकी हित सुरक्षित रहेंगे। कहा जाता है कि यह रिपोर्ट केंद्र सरकार के पास भी है।
रुक गया पश्चिम बंगाल का इस्लामीकरण
ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल का इस्लामीकरण कर दिया था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तृणमूल सरकार का आखिरी बजट है। ममता बनर्जी ने उद्योगीकरण के लिए 11सौ करोड़ का प्रावधान किया था जबकि मुसलानों के लिए पांच हजार सात सौ करोड़ रुपये। अब बीजेपी सरकार के आने के बाद इंडस्ट्री से ज्यादा मुसलमानों को दिए जा रहे बजट पर रोक लगेगी।
डेमोग्राफी चेंज पर रोक लगेगी
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही पूरे देश के लिए एक दिशा-निर्देशक रही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में राज्य ने जिस तरह की राजनीतिक और जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना किया है, उसने राष्ट्रभक्तों और विचारकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं। इस परिप्रेक्ष्य में ममता बनर्जी की चुनावी हार को केवल एक सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और सुरक्षात्मक अस्मिता की वापसी के रूप में देखा जा रहा है।
वोट के लिए मुसलमानों का अपीज़मेंट
ममता शासनकाल के दौरान सबसे बड़ा कलंक यह है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते राज्य के संरक्षण में डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को बदला गया। सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को योजनाबद्ध तरीके से बसाने की खबरें लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बनी रहीं। आरोप है कि स्थानीय प्रशासन की मदद से इन्हें न केवल शरण दी गई, बल्कि इनके राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज़ तैयार कर इन्हें एक स्थायी ‘वोट बैंक’ में तब्दील कर दिया गया। जब किसी राज्य की जनसांख्यिकी अवैध घुसपैठ के जरिए बदली जाती है, तो वहां की मूल संस्कृति, संसाधन और कानून-व्यवस्था पर गंभीर संकट पैदा हो जाता है। इसी दृष्टिकोण से, ‘दीदी’ की हार को बंगाल की मूल पहचान को बचाने के जरूरी था।
राष्ट्रवादी हिंदुत्व का उद्गम स्थल
बंगाल की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वही भूमि है जिसने भारत को राष्ट्रवाद के सबसे बड़े मंत्र दिए।
वंदे मातरम: राष्ट्रभक्ति का अमर गीत ‘वंदे मातरम’ बंकिमचंद्र चटर्जी की कलम से इसी बंगाल की मिट्टी में उपजा था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की चूल्हे हिला दी थीं।
जय हिंद: ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ के नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘जय हिंद’ का उद्घोष कर पूरे देश को एकजुट किया था।
पुनर्जागरण: हिंदुवाद का आधुनिक आंदोलन और सांस्कृतिक चेतना का संचार भी बंगाल के ‘भद्रलोक’ और मनीषियों द्वारा ही शुरू किया गया था।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जनसंघ की विरासत
आज जो राजनीतिक बदलाव हम देख रहे हैं, उसकी नींव दशकों पहले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रखी थी। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जब पूरे भारत में भारतीय जनसंघ संघर्ष कर रहा था, तब बंगाल ने ही उसे सहारा दिया था। उस दौर में जनसंघ की पूरे देश में मात्र तीन सीटें आई थीं, जिनमें से दो सीटें पश्चिम बंगाल से थीं और एक राजस्थान से। डॉ. मुखर्जी स्वयं बंगाल के प्रबुद्ध ‘भद्र लोक’ का प्रतिनिधित्व करते हुए चुनाव जीते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि बंगाल की मूल तासीर हमेशा से ही राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक रूप से सजग रही है।
ममता के खिलाफ भद्रलोक का मौन विद्रोह
ममता बनर्जी की हार को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि बंगाल के मतदाताओं ने शायद उस तुष्टिकरण की राजनीति को नकार दिया है जो राज्य के मूल स्वरूप को खतरे में डाल रही थी। घुसपैठ और डेमोग्राफी के बदलाव के खिलाफ यह एक मौन विद्रोह था। यह संदेश है कि बंगाल अब अपनी उस पुरानी पहचान को फिर से प्राप्त करना चाहता है जहाँ ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम’ का घोष राजनीतिक विवशता नहीं, बल्कि गर्व का विषय हो।