Karnataka की सरकार ‘सिद्धा के आशीर्वाद’ से चलाएंगे डीके शिवकुमार

Karnataka की सरकार ‘सिद्धा के आशीर्वाद’ से चलाएंगे डीके शिवकुमार

Karnatakaकर्नाटक की राजनीति में २८ मई २०२६ का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। बेंगलुरु के कुमारकृपा रोड पर स्थित मुख्यमंत्री आवास ‘कृष्णा’ में जब सुबह कैबिनेट मंत्रियों के लिए पारंपरिक कन्नड़ व्यंजनों की मेज सजी थी, तो वहां कोई हैरानी या सस्पेंस का माहौल तो नहीं था लेकिन एक चुप्पी जरूर थी।

दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के साथ हुई मैराथन बैठकों के बाद यह पहले ही पूरी तरह साफ और तय हो चुका था कि सिद्धा रमैया Karnataka के  मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। मंत्रियों से लेकर विधायकों तक, पूरी पार्टी को इस बदलाव की पटकथा पहले से मालूम थी। जैसे ही ७८ वर्षीय मुख्यमंत्री सिद्धा रमैया (Siddaramaiah) ने अपनी बात शुरू की, उन्होंने केवल इस पर औपचारिक मुहर लगाई।पांच दशकों के राजनीतिक जीवन और कर्नाटक (Karnataka) के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले सिद्धा रमैया ने  बैठक में नए सीएम के रूप में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (D.K. Shivakumar) के नाम का ऐलान कर दिया।

डीके ने सिद्धा के छुए पैर

सदन और संगठन के भीतर एकजुटता का संदेश देने के लिए एक बेहद रणनीतिक तस्वीर सामने आई। बैठक शुरू होने से ठीक पहले, डीके शिवकुमार ने आगे बढ़कर सिद्धा रमैया के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाया। यह कर्नाटक (Karnataka) कांग्रेस के दो सबसे बड़े ध्रुवों के बीच तीन साल से चली आ रही ‘पॉवर टनल’ की रेस का एक सुखांत और पहले से तय पटाक्षेप था।

2023 की  जीत और सत्ता का फार्मूला

इस पूरी कहानी की शुरुआत मई २०२३ के विधानसभा चुनाव से होती है। उस समय कर्नाटक में भारतीय पाना पार्टी (भाजपा) के खिलाफ कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार थी। डीके शिवकुमार बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (KPCC Chief) जमीन पर पसीना बहा रहे थे, तो दूसरी तरफ सिद्धा रमैया अपनी ‘अहिंदा’ (AHINDA – अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) सोशल इंजीनियरिंग के जरिए रैलियों में भीड़ जुटा रहे थे। जब चुनाव परिणाम आए, तो कांग्रेस ने 135 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया। लेकिन असली संकट जीत के बाद शुरू हुआ।

हाईकमान के सामने यक्ष प्रश्न

कर्नाटक (Karnataka) में बड़ी जीत के बाद भी पार्टी हाईकमान के सामने सवाल यह खी मुख्यमंत्री कौन बनेगा? डीके शिवकुमार का दावा था कि उन्होंने जेल जाने, केंद्रीय एजेंसियों  का दबाव झेलने के बावजूद संकट के समय पार्टी को संभाला और जीत की नींव रखी। वहीं सिद्धा रमैया का दावा था कि  राज्य भर के जननेता वही हैं और विधायकों का बहुमत (विधायक दल की गुप्त वोटिंग में) उनके पक्ष में था।

दिल्ली में बैठकों का दौर और रोटेशनल सीएम का फार्मूला

दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास और राहुल गांधी की मौजूदगी में मैराथन बैठकें हुईं। 5 दिनों के गतिरोध के बाद एक बीच का रास्ता निकाला गया। 20 मई 2023 को सिद्धा रमैया ने मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार ने इकलौते उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। हालांकि, पार्टी ने कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक उसी समय ढाई-ढाई साल का एक रोटेशनल सीएम फॉर्मूला तय हुआ था। तय था कि पहले ढाई साल सिद्धा रमैया सरकार चलाएंगे और उसके बाद कमान शिवकुमार को सौंपी जाएगी।

सिद्धा रमैया का शासनः सिद्धा रमैया ने सत्ता संभालते ही कांग्रेस के ‘पांच वादों’ (5 Guarantees) को लागू करने पर पूरा जोर दिया। गृह ज्योति (मुफ्त बिजली), गृह लक्ष्मी (महिला मुखिया को 2000 रुपये), अन्न भाग्य (मुफ्त चावल), युवा निधि (बेरोजगारी भत्ता) और शक्ति योजना (महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा)। इन योजनाओं ने सिद्धा रमैया को गरीबों और ग्रामीण मतदाताओं के बीच ‘अन्नदाता’ के रूप में स्थापित कर दिया।

लंबे समय तक कर्नाटक का सीएम रहने का रिकॉर्ड और डीके का दबाव

जनवरी 2026 में सिद्धा रमैया ने एक और बड़ा मील का पत्थर छुआ। वे कर्नाटक (Karnataka) के इतिहास में (दो कार्यकालों को मिलाकर) सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन गए।  उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री डी. देवराज अर्स के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।लेकिन सत्ता की इस चमक के पीछे एक अंदरूनी खींचतान लगातार चल रही थी। डीके शिवकुमार के समर्थक विधायक और मंत्री गाहे-बगाहे दिल्ली का रुख करते थे और आलाकमान को याद दिलाते थे कि “ढाई साल का समय पूरा होने वाला है।” खासकर नवंबर 2025 के बाद से शिवकुमार खेमे ने दबाव बेहद बढ़ा दिया था।

सिद्धा को राष्ट्रीय राजनीति का आमंत्रण

2026 की शुरुआत से ही कांग्रेस आलाकमान ने 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी थीं। राहुल गांधी देश भर में जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय (OBC राजनीति) को मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर एक कद्दावर, साफ-सुथरी छवि वाले और अनुभवी ओबीसी (OBC) चेहरे की सख्त जरूरत है।  सिद्धा रमैया और डीके शिवकुमार को अचानक दिल्ली तलब किया गया। मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल के साथ कई दौर की बंद कमरों में बैठकें हुईं।

सम्मान जनक एग्जिट पैकेज

हाईकमान ने सिद्धा रमैया को कर्नाटक (Karnataka) बेहद सम्मानजनक ‘एग्जिट पैकेज’ की पेशकश की। पहला यह कि सिद्धा को राज्यसभा सीट दी जाएगी। जून 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनावों में उन्हें संसद भेजा जाएगा। दूसरा यह कि  उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) में राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी लामबंदी का मुख्य चेहरा बनाया जाएगा।दिल्ली की इस आखिरी बैठक में ही यह पूरी तरह तय हो गया था कि सिद्धा रमैया बेंगलुरु लौटकर अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। इसीलिए जब वे वापस आए, तो उनके खेमे में कोई छटपटाहट नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और गरिमापूर्ण बदलाव की तैयारी थी।

डीके के आवास पर जश्न का माहौल

‘ट्रबलशूटर’ से ‘कैप्टन’ तक 64 वर्षीय डीके शिवकुमार को कर्नाटक (Karnataka) कांग्रेस का ‘संकटमोचक’ (Troubleshooter) कहा जाता है। चाहे गुजरात के विधायकों को रिसॉर्ट में सुरक्षित रखना हो, या महाराष्ट्र और खुद कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस के समय सरकार बचाना हो, शिवकुमार हमेशा कांग्रेस के लिए ढाल बनकर खड़े रहे। उनके पास मजबूत संगठनात्मक क्षमता है और वे वोक्कालिगा (Vokkaliga) समुदाय के सबसे बड़े चेहरों में से एक हैं। जैसे ही सिद्धा रमैया ने विदाई का ऐलान किया, सदाशिवनगर में डीके शिवकुमार के आवास के बाहर जश्न का माहौल बन गया। समर्थकों ने एक दूसरे को बधाई दी।

बहुत कठिन है डगर डीके शिव कुमार की

डीके शिवकुमार की नई सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली- सिद्धा खेमे को साधना है। सिद्धा रमैया के करीबी मंत्रियों (जैसे जी. परमेश्वर, सतीश जारकीहोली) को कैबिनेट में संतुष्ट रखना ताकि सरकार स्थिर रहे। दूसरी- उपमुख्यमंत्री का संतुलन बना कर रखना।  कयास हैं कि क्षेत्रीय और जातीय संतुलन (दलित, लिंगायत और अल्पसंख्यक) साधने के लिए डीके सरकार में 2 से 3 नए उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती 2027 का सेमीफाइनल है। अगले साल होने वाले स्थानीय निकाय और सांगठनिक परीक्षाओं में खुद को सफल साबित करना डीके की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

कर्नाटक की राजनीति पर प्रभाव

सिद्धा रमैया के हटने से कर्नाटक (Karnataka) में ‘अहिंदा’ (पिछड़ा वर्ग-दलित-अल्पसंख्यक) गठबंधन के कुछ मतदाता असहज महसूस कर सकते हैं, जिसकी भरपाई के लिए कांग्रेस जी. परमेश्वर जैसे वरिष्ठ दलित नेताओं को बड़ा पोर्टफोलियो दे सकती है। वहीं, डीके शिवकुमार के आने से वोक्कालिगा समुदाय पर कांग्रेस की पकड़ और मजबूत होगी, जो पारंपरिक रूप से जेडीएस (JDS) का वोट बैंक माना जाता रहा है।वि

जबरन थोपा गया नेतृत्व परिवर्तन

विपक्ष (भाजपा और जेडीएस) इस बदलाव को जबरन थोपा गया नेतृत्व परिवर्तन और कमजोर सरकार की निशानी बताकर घेरने की कोशिश करेगा। लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह से सिद्धा रमैया और शिवकुमार के गले मिलने और पैर छूने की तस्वीरों को ‘Then, Now, Forever – Unity is our strength’ के संदेश के साथ प्रचारित किया है, उससे साफ है कि पार्टी ने इस संक्रमण काल (Transition) को बेहद शांतिपूर्ण ढंग से संभालने की स्क्रिप्ट पहले ही लिख ली थी।

ऐन मौके पर राज्यपाल मध्यप्रदेश चले गए

इधर बेंगलुरु में सियासी हलचल के बीच एक नया प्रशासनिक मोड़ भी सामने आया है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत अचानक किसी आवश्यक कार्य से कर्नाटक (Karnataka) से बाहर चले गए हैं। इसके बावजूद सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं आएगी। सिद्धा रमैया दोपहर बाद राजभवन पहुंचकर सीधे राज्यपाल सचिवालय (Governor’s Secretariat) को अपना आधिकारिक इस्तीफा सौंप देंगे, जिसके बाद नए मंत्रिमंडल के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। कर्नाटक कांग्रेस के इतिहास में यह एक युग का अंत और एक नए ‘पॉवर सेंटर’ की आधिकारिक शुरुआत है।

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कर्नाटक के नए सीएम डीके शिवकुमार के बारे में सारी जानकारी

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