Trump Tariff War अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने यूरोपीय संघ (EU) पर व्यापार समझौते की शर्तों को तोड़ने का गंभीर आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि वे सत्ता में आते हैं, तो यूरोपीय कारों पर 25 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (Import Tariff) लगा सकते हैं।
ट्रंप के इस बयान के बाद जर्मनी और फ्रांस सहित यूरोप के प्रमुख कार निर्माता देशों में चिंता की लहर दौड़ गई है।
क्या है पूरा विवाद?
डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि यूरोपीय संघ अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक वादों को निभाने में विफल रहा है। उनके अनुसार, यूरोपीय देश अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाजारों को पूरी तरह नहीं खोल रहे हैं, जबकि अमेरिका ने यूरोपीय उत्पादों को काफी रियायतें दी हैं।
ट्रंप ने विशेष रूप से ऑटोमोबाइल सेक्टर को निशाना बनाते हुए कहा कि यूरोपीय सड़कों पर अमेरिकी कारें (जैसे फोर्ड या शेवरले) बहुत कम दिखाई देती हैं, जबकि अमेरिका की सड़कों पर मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और फॉक्सवैगन जैसी यूरोपीय कारों की भरमार है। ट्रंप इसे “असंतुलित व्यापार” करार दे रहे हैं।
यूरोपीय कार उद्योग पर क्या होगा असर?
यदि 25% टैरिफ लागू होता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान जर्मनी को होगा, क्योंकि जर्मन अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कार निर्यात पर निर्भर है।
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कीमतों में भारी उछाल: अमेरिका में यूरोपीय कारों की कीमतें 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जिससे उनकी बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है।
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छंटनी का डर: निर्यात घटने से यूरोप के ऑटो सेक्टर में नौकरियों पर खतरा मंडरा सकता है।
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व्यापार युद्ध (Trade War): विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका टैरिफ लगाता है, तो यूरोपीय संघ भी अमेरिकी कृषि उत्पादों (जैसे सोयाबीन और कॉर्न) या तकनीकी सेवाओं पर पलटवार कर सकता है।
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यूरोपीय अर्थव्यवस्था की ‘रीढ़’ पर हमला
यूरोप के लिए कार उद्योग सिर्फ एक बिजनेस नहीं, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। खासकर जर्मनी की जीडीपी (GDP) का एक बड़ा हिस्सा मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू, और फॉक्सवैगन जैसी कंपनियों के निर्यात पर निर्भर है।
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जर्मन कंपनियों को सबसे ज्यादा चोट: अमेरिका जर्मन लग्जरी कारों का सबसे बड़ा बाजार है। 25% टैरिफ का मतलब है कि एक $60,000 की कार रातों-रात $75,000 की हो जाएगी। इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के बीच इन कारों की डिमांड घट जाएगी।
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सप्लाई चेन पर असर: कार निर्माण में हजारों छोटे पुर्जे (Parts) इस्तेमाल होते हैं जो पूरी दुनिया से आते हैं। एक सेक्टर पर हमला पूरी वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करेगा।
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ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस तरह की सख्त रणनीति अपनाई है। अपने पिछले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने चीन और यूरोपीय देशों के खिलाफ टैरिफ का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया था। उनकी इस घोषणा को उनकी ‘America First’ नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना और व्यापार घाटे को कम करना है।
क्यों भड़के हैं ट्रंप? ‘असंतुलित व्यापार’ का आरोप
डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा मुख्य रूप से व्यापार घाटे (Trade Deficit) पर केंद्रित है। ट्रंप के अनुसार, यूरोपीय संघ जानबूझकर अमेरिकी उत्पादों के लिए बाधाएं पैदा करता है। उन्होंने अपने भाषण में कहा, “वे हमारे देश में लाखों कारें भेजते हैं, लेकिन जब हम अपनी कारें वहां भेजना चाहते हैं, तो वे तकनीकी नियमों और टैक्स का ऐसा जाल बुनते हैं कि हमारी गाड़ियां वहां बिक ही नहीं पातीं।”
ट्रंप का दावा है कि यूरोपीय संघ ने उनके कार्यकाल के दौरान हुए समझौतों का सम्मान नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ब्लॉक ने व्यापार बाधाओं को कम करने के बजाय उन्हें और अधिक जटिल बना दिया है। उनके निशाने पर खास तौर पर जर्मनी है, जो यूरोप का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल हब है।
हॉर्मुज का ‘सीक्रेट गेम’: ट्रंप की नाराजगी की असली वजह
डोनाल्ड ट्रंप की यूरोप से नाराजगी केवल कारों या व्यापार घाटे तक सीमित नहीं है; इसके पीछे गहरे रणनीतिक और कूटनीतिक कारण भी हैं। इसमें सबसे प्रमुख मुद्दा है— ईरान (Iran)।
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ईरान न्यूक्लियर डील और यूरोप का स्टैंड: जब ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से हाथ खींच लिए थे और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, तब यूरोपीय संघ (EU) ने अमेरिका का साथ देने के बजाय इस समझौते को बचाने की कोशिश की थी। ट्रंप इसे एक ‘विश्वासघात’ के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि जब अमेरिका वैश्विक सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाता है, तो यूरोप अपने आर्थिक हितों के लिए पीछे हट जाता है।
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प्रतिबंधों को चकमा देने की कोशिश (INSTEX): ट्रंप की नाराजगी तब और बढ़ गई जब यूरोप ने अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए INSTEX जैसे वैकल्पिक पेमेंट गेटवे और नए व्यापारिक रास्ते ढूंढ लिए, ताकि वे ईरान से तेल और अन्य सामान का लेन-देन जारी रख सकें। ट्रंप का तर्क है कि यूरोप एक तरफ अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी (NATO के जरिए) चाहता है और दूसरी तरफ अमेरिका के ‘दुश्मनों’ के साथ व्यापार कर रहा है।
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हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और गोपनीय समझौते: वैश्विक तेल व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा ‘हॉर्मुज की जलसंधि’ से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में तनाव और ईरान द्वारा संभावित नाकेबंदी से यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। सूत्रों और विश्लेषकों का दावा है कि इस संकट से बचने के लिए यूरोप के कुछ देशों ने ईरान के साथ ‘गोपनीय समझौते’ किए हैं ताकि उनकी तेल आपूर्ति बाधित न हो।
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ट्रंप का ‘डबल स्टैंडर्ड’ का आरोप: ट्रंप अक्सर सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि यूरोप ‘स्मार्ट’ बनने की कोशिश कर रहा है। वे इसे अमेरिका के साथ ‘धोखाधड़ी’ मानते हैं। उनके लिए 25% कार टैरिफ केवल एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि यूरोप को यह चेतावनी देने का तरीका है कि— “यदि आप सुरक्षा और व्यापार में हमारा साथ नहीं देंगे, तो आपको इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।”
यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया
हालाँकि ब्रसेल्स (EU मुख्यालय) की ओर से अभी कोई आधिकारिक तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यूरोपीय अधिकारियों ने पहले भी कहा है कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों (WTO) का पालन करते हैं। यूरोपीय संघ का तर्क है कि वे अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक हैं और इस तरह के एकतरफा टैरिफ से वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाएगी।यूरोपीय संघ के व्यापार आयुक्तों ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका एकतरफा टैरिफ लगाता है, तो यूरोप भी शांत नहीं बैठेगा।
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अमेरिकी उत्पादों पर नजर: जवाब में यूरोप अमेरिकी हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिलों, व्हिस्की, सोयाबीन और ऑरेंज जूस जैसे उत्पादों पर भारी टैक्स लगा सकता है।
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टेक कंपनियों पर शिकंजा: यूरोप में पहले से ही अमेरिकी टेक दिग्गजों (Google, Apple, Amazon) पर टैक्स लगाने की चर्चा चल रही है। ट्रेड वॉर की स्थिति में इन कंपनियों पर डिजिटल टैक्स का बोझ बढ़ाया जा सकता है।