Corruption in Judiciary सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उन तीन शिक्षाविदों (Academics) को ब्लैकलिस्ट करने के अपने पुराने आदेश को वापस ले लिया है, जो कक्षा 8 की NCERT पुस्तक के विवादित चैप्टर को तैयार करने में शामिल थे। यह चैप्टर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार (Corruption in Judiciary) से संबंधित था, जिस पर शीर्ष अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने प्रोफेसर मिशेल डैनिनो (Professor Michel Danino), सुपर्णा दिवाकर (Suparna Diwakar) और आलोक प्रसन्ना कुमार (Alok Prasanna Kumar) द्वारा दायर आवेदनों पर सुनवाई करते हुए यह राहत दी है।
अदालत ने अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने आदेश में इन शिक्षाविदों के खिलाफ गंभीर टिप्पणियां की थीं। तब कोर्ट ने कहा था कि इन तीनों ने “कक्षा 8 के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने के लिए जानबूझकर और सोच-समझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया।”
शुक्रवार को अपने नए आदेश में कोर्ट ने इन प्रतिकूल टिप्पणियों को पूरी तरह से हटा (Expunged) दिया है। पीठ ने शिक्षाविदों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण पर संतोष व्यक्त किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस चैप्टर को तैयार करने में उनकी कोई दुर्भावना (Malice) नहीं थी और यह एक सामूहिक निर्णय (Collective Decision) के तहत अंतिम रूप दिया गया था।
ब्लैकलिस्टिंग का आदेश रद्द, सरकारें लेंगी स्वतंत्र फैसला
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्रीय/राज्य विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया था कि वे सार्वजनिक धन (Public Funds) से चलने वाले किसी भी शैक्षणिक प्रोजेक्ट या पाठ्यक्रम संबंधी कार्य से इन तीनों विशेषज्ञों को तत्काल दूर (Disassociate) करें।
अब कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटाते हुए स्पष्ट किया है कि केंद्र और राज्य सरकारें इन विशेषज्ञों को शैक्षणिक कार्यों से जोड़ने या न जोड़ने के लिए अपने स्तर पर स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। कोर्ट का पुराना आदेश उन पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा।
सुनवाई के दौरान वकीलों की दलीलें
सुनवाई के दौरान प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि 11 मार्च का आदेश इन विशेषज्ञों का पक्ष सुने बिना ही पारित कर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी “एक व्यक्ति के लेखन” का मामला नहीं था, बल्कि 40 से अधिक सदस्यों के एक डिजिटल ग्रुप में चर्चा के बाद लिया गया एक सामूहिक निर्णय था। उन्होंने कोर्ट से इस आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया क्योंकि इसके उनके करियर पर बहुत दूरगामी और गंभीर परिणाम हो रहे थे।
वहीं आलोक प्रसन्ना कुमार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका पर दिया गया यह चैप्टर वास्तव में कक्षा 6 और 7 के अध्यायों की ही अगली कड़ी था। इस पुस्तक में प्रशासन के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर भी चर्चा की गई थी।
क्या था पूरा विवाद
यह विवाद फरवरी 2026 में तब शुरू हुआ था जब एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की पाठ्यपुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ के एक सब-टॉपिक “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर मीडिया में खबरें आईं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया था। कोर्ट ने शुरुआत में टिप्पणी की थी कि यह पाठ्यपुस्तक प्रथम दृष्टया न्यायपालिका की छवि खराब करने के उद्देश्य से तैयार की गई थी।
इसके बाद एनसीईआरटी (NCERT) ने इस पर माफी मांगते हुए पुस्तक से इस विवादित हिस्से को हटा लिया था और सरकार को भरोसा दिया था कि एक पूर्व जज की अध्यक्षता में बनी विशेषज्ञ समिति की मंजूरी के बाद ही नया और संशोधित कंटेंट शामिल किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ब्लैकलिस्टिंग का आदेश वापस लिए जाने से इन तीनों शिक्षाविदों को बड़ी राहत मिली है।
