Bhojshala मंदिर है मस्जिद नहीं, मुसलमान दूसरी जगह तलाशें, Indore High Court का बड़ा फैसला

Bhojshala मंदिर है मस्जिद नहीं, मुसलमान दूसरी जगह तलाशें, Indore High Court का बड़ा फैसला

Bhojshala मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खण्डपीठ ने आज बहुत बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि भोजशाला में मंदिर था। सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन इस मामले की पैरवी कर रहे थे।

धार (मध्य प्रदेश) के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद का मामला सदियों पुराना है। आज यानी 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ इस पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना चुकी है। हिंदू पक्ष के वकी विष्णु जैन ने कहा कि इंदौर बेंच ने स्पष्ट रूप से भोजशाला को वागदेवी सरस्वती का मंदिर माना है। कोर्ट ने पूरे परिसर को मंदिर परिसर घोषित किया है। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से कहा है कि वो चाहें तो मस्जिद के लिए वैकल्पिक स्थान की मांग राज्य सरकार से कर सकते हैं और सरकार उस पर विचार करेगी। वहीं मस्जिद पक्ष ने कहा है कि वो इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

इस पूरे विवाद की ऐतिहासिक और कानूनी डेटलाइनः

प्राचीन और मध्यकालीन काल (नींव और परिवर्तन)

1034 ईस्वी: परमार वंश के राजा भोज ने धार में ‘सरस्वती सदन’ (भोजशाला) की स्थापना की। यह संस्कृत अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र और वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर था।

1305 ईस्वी: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान भोजशाला को नुकसान पहुँचाया गया।

1401 ईस्वी: मालवा के सुल्तान दिलावर खान गोरी ने परिसर के एक हिस्से में मस्जिद का निर्माण कराया।

1514 ईस्वी: सुल्तान महमूद शाह खिलजी ने यहाँ कमाल मौला की दरगाह के पास एक और मस्जिद बनवाई।

ब्रिटिश गुलामी काल और मूर्ति का विवाद

1875 – 1880: खुदाई के दौरान यहाँ वाग्देवी (सरस्वती) की एक खंडित प्रतिमा मिली। 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी मेजर किनकैड इसे अपने साथ लंदन ले गया, जो आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में है।

1902: लॉर्ड कर्जन ने धार का दौरा किया और भोजशाला के संरक्षण के लिए धन आवंटित किया।

1935: धार रियासत ने एक अधिसूचना जारी कर मुसलमानों को जुमे की नमाज की अनुमति दी।

आजादी के बाद और कानूनी लड़ाई (1947 – 2023)

1951: भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया और इसके संरक्षण की जिम्मेदारी ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को दी।

1995: विवाद बढ़ने लगा। हिंदू संगठनों ने सरस्वती मंदिर में पूजा की मांग तेज की।

7 अप्रैल 2003: ASI ने एक समझौता आदेश जारी किया। इसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार को पूजा करने और मुसलमानों को हर शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई।

2022: ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने और हिंदुओं को पूर्ण पूजा अधिकार देने की मांग की।

हालिया घटनाक्रम और कोर्ट का फैसला (2024 – 2026)

11 मार्च 2024: इंदौर हाईकोर्ट ने ASI को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण (ASI Survey) करने का आदेश दिया।

22 मार्च – 15 जुलाई 2024: ASI ने 98 दिनों तक ज्ञानवापी की तर्ज पर आधुनिक मशीनों (GPR) से सर्वे किया। 15 जुलाई को 2,189 पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की गई।

रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष: ASI के अनुसार, मस्जिद का निर्माण पहले से मौजूद एक विशाल हिंदू मंदिर के अवशेषों और खंभों का उपयोग करके किया गया था।

6 अप्रैल 2026: जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने इस मामले पर नियमित सुनवाई शुरू की।

12 मई 2026: सभी पक्षों (हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्ष, जिन्होंने इसे जैन गुरुकुल बताया) की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

15 मई 2026 (आज): इंदौर बेंच इस विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। अब भोजशाला में सिर्फ पूजा होगी, नमाज नहीं पढ़ी जाएगी।

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