Nepal: पीएम बालेन शाह (Balendra Shah) बने तो भारत के साथ रिश्ते कैसे होंगे

Nepal: पीएम बालेन शाह (Balendra Shah) बने तो भारत के साथ रिश्ते कैसे होंगे

बालेंद्र शाह (Balendra Shah) यदि भविष्य में प्रधानमंत्री बनते हैं, तो भारत-नेपाल संबंधों पर इसके संभावित प्रभावों का आकलन करना एक जटिल विषय है।

बालेंद्र शाह की राजनीतिक शैली और उनके अतीत के बयानों को देखते हुए, भारत के साथ उनके संबंधों की दिशा को लेकर विशेषज्ञों के बीच विभिन्न दृष्टिकोण हैं।

भारत-विरोधी बयान
बालेंद्र शाह अपने सोशल मीडिया पोस्ट और बयानों के कारण चर्चा में रहे हैं, जिन्हें भारत-विरोधी माना गया है:

सांस्कृतिक विवाद: ‘आदिपुरुष’ फिल्म विवाद के दौरान माता सीता के जन्मस्थान को लेकर उन्होंने तीखी टिप्पणी की थी, जिसे नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता पर हमला बताया गया था।

क्षेत्रीय मानचित्र विवाद: जब भारतीय संसद में ‘अखंड भारत’ का नक्शा प्रदर्शित किया गया, तो उसके विरोध में उन्होंने अपने कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया, जिसमें भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। यह भारत के साथ राजनयिक तनाव का एक बड़ा कारण बना था।

कठोर बयान: उन्होंने कभी-कभी नेपाल की नीतियों को लेकर भारत के कथित हस्तक्षेप पर तीखी आलोचना की है, जिससे उनके प्रति भारत में संदेह का माहौल पैदा हुआ है।

2. राष्ट्रवादी और ‘स्वतंत्र’ छवि
युवाओं के बीच लोकप्रियता: बालेन की छवि एक ऐसे नेता की है जो पारंपरिक राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार और पुरानी कार्यशैली के खिलाफ है। वे एक ‘सिस्टम-बदलने’ वाले नेता के रूप में देखे जाते हैं।

राष्ट्रवाद: उनकी राजनीति का आधार नेपाल का राष्ट्रवाद है। वे अक्सर ऐसे मुद्दे उठाते हैं जो नेपाल की संप्रभुता से जुड़े होते हैं, जो कभी-कभी द्विपक्षीय संबंधों में एक अवरोध बन जाते हैं।

3. प्रधानमंत्री बनने पर संभावित परिदृश्य
यदि बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उनके नेतृत्व में संबंधों का स्वरूप इस पर निर्भर करेगा कि वे एक ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में काम करते हैं या एक राजनियक के रूप में:

व्यावहारिक रुख: विशेषज्ञों का मानना है कि मेयर के रूप में उनकी कार्यशैली तकनीकी और सुधारवादी रही है। सत्ता संभालने के बाद, कोई भी नेता जमीनी हकीकत को समझता है। भारत और नेपाल के बीच भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक निर्भरता इतनी गहरी है कि इसे पूरी तरह से नजरअंदाज करना किसी भी नेपाली प्रधानमंत्री के लिए कठिन होता है।

चीन बनाम भारत का संतुलन: नेपाल की विदेश नीति पारंपरिक रूप से दोनों पड़ोसियों के बीच ‘संतुलन’ बनाने की रही है। यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उन्हें यह तय करना होगा कि क्या वे चीन के साथ संबंधों को भारत के मुकाबले अधिक प्राथमिकता देते हैं या एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं।

रणनीतिक चुनौतियों का समाधान: यदि वे वास्तव में प्रधानमंत्री पद तक पहुँचते हैं, तो उन्हें भारत के साथ ग्रेटर नेपाल जैसे विवादास्पद मुद्दों पर कूटनीतिक संयम बरतना होगा, अन्यथा यह नेपाल की अर्थव्यवस्था और स्थिरता के लिए हानिकारक हो सकता है।

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Rajeev Sharma

Chief Editor & CEO PhD, LLB
Fact Checked & Editorial Guidelines
Reviewed by: Subject Matter Experts

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