Haridwar land scam उत्तराखंड की नौकरशाही में हाल ही में एक ऐसा बड़ा भूचाल आया है, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को एक नई परिभाषा दी है। बहुचर्चित Haridwar land scam मामले में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए एक आईएएस (IAS) अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) और एक प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी पर भी कठोर दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।
newswala.org की इस एक्सक्लूसिव और विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि आखिर कैसे 14-15 करोड़ रुपये की सामान्य सी जमीन को पूरे 54 करोड़ रुपये में खरीदा गया और किस तरह इस विशाल Haridwar land scam का पर्दाफाश हुआ, जिसने शासन से लेकर प्रशासन तक की नींव हिला कर रख दी।
क्या है 54 करोड़ रुपये का Haridwar land scam?
इस पूरे विवाद की जड़ साल 2024 के अंतिम महीनों में हुए एक जमीन सौदे में छिपी है। इस चर्चित Haridwar land scam की शुरुआत तब हुई जब हरिद्वार नगर निगम (HMC) ने सराय गांव में कूड़ा डंपिंग ग्राउंड के पास करीब 33 बीघा (लगभग 2.307 हेक्टेयर) जमीन खरीदने का प्रस्ताव पारित किया। बाजार के जानकारों और राजस्व विभाग के मूल्यांकन के अनुसार, उस समय उस डंपिंग साइट के पास स्थित जमीन की वास्तविक कीमत महज 14 से 15 करोड़ रुपये के बीच थी।
लेकिन, प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत और लालच के कारण इसी अनुपयोगी जमीन का सौदा पूरे 54 करोड़ रुपये में तय किया गया। इस तरह सीधे तौर पर सरकारी खजाने को लगभग 39 करोड़ रुपये का भारी नुकसान पहुंचाया गया। इस Haridwar land scam में शामिल अधिकारियों ने सारे नियमों को ताक पर रखते हुए कृषि भूमि को रातों-रात वाणिज्यिक (कमर्शियल) दरों पर खरीद लिया।
Haridwar land scam में DM की संदिग्ध भूमिका
इस पूरे Haridwar land scam में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिले के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी भी इस भ्रष्टाचार में पूरी तरह से संलिप्त पाए गए। शासन की जांच रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) कर्मेंद्र सिंह और तत्कालीन नगर आयुक्त एवं आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी की भूमिका इस मामले में सबसे संदिग्ध रही।
इस Haridwar land scam को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए भूमि खरीद से जुड़ी अनिवार्य प्रक्रियाओं और समितियों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कृषि भूमि का भू-उपयोग परिवर्तन (धारा 143 के तहत कमर्शियल उपयोग), जिसमें आमतौर पर महीनों का समय लगता है, उसे इस Haridwar land scam के सूत्रधारों ने मात्र छह दिनों के भीतर पूरा करवा लिया।
शासन ने तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह को पदीय दायित्वों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही का दोषी मानते हुए उनके खिलाफ दीर्घ शास्ति (मेजर पनिशमेंट) अधिरोपित करने का सख्त निर्णय लिया है। वहीं, आईएएस वरुण चौधरी को सेवा से बर्खास्त करने के लिए केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को अंतिम संस्तुति भेज दी गई है।
SDM और अन्य कर्मचारियों पर कैसे गिरी गाज?
इस बहुचर्चित Haridwar land scam की आंच केवल आईएएस स्तर के अधिकारियों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें शामिल पीसीएस (PCS) अधिकारियों और निचले कर्मचारियों पर भी उतनी ही सख्त गाज गिरी है। हरिद्वार के तत्कालीन एसडीएम (SDM) और 2017 बैच के पीसीएस अफसर अजयवीर सिंह की भूमिका भी इस Haridwar land scam में बेहद संदिग्ध पाई गई। भूमि सौदे के कागजातों में घालमेल और लापरवाही बरतने के आरोप में सरकार ने एसडीएम अजयवीर सिंह के खिलाफ ‘परनिंदा प्रविष्टि’ (Censure Entry) दर्ज करने और उनकी तीन वेतन वृद्धि (सैलरी इंक्रीमेंट) रोकने का कड़ा आदेश जारी किया है।
इसके अतिरिक्त, इस Haridwar land scam में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संलिप्त 10 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी विजिलेंस को एफआईआर (FIR) दर्ज करने की पूर्ण अनुमति दे दी गई है। इनमें तत्कालीन सहायक नगर आयुक्त रविंद्र कुमार दयाल, कर अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट, सहायक अभियंता आनंद सिंह मिश्रा, लिपिक वेदपाल और मानचित्रकार दिनेश कांडपाल जैसे महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं।
Haridwar land scam का खुलासा कैसे हुआ?
भ्रष्टाचार के इतने बड़े खेल का पर्दाफाश रातों-रात नहीं हुआ। इस Haridwar land scam की असल पटकथा सितंबर 2024 में लिखी गई थी, जब कुछ किसानों ने निगम को अपनी जमीन बेचने का प्रस्ताव दिया था। नवंबर 2024 तक इस डील को गुपचुप तरीके से पूरा कर लिया गया।
मामला तब बिगड़ा जब अप्रैल 2025 में हरिद्वार की मेयर किरण जायसवाल को इस बड़े घपले की भनक लगी। उन्होंने तुरंत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर इस Haridwar land scam से जुड़े सभी तथ्य उनके सामने रखे। मामले की गंभीरता को भांपते हुए सीएम धामी ने तुरंत वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रणवीर सिंह चौहान के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया। रणवीर चौहान ने हरिद्वार जाकर गहराई से जांच की और मई 2025 में 100 पन्नों की एक विस्तृत जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी। इसी अहम रिपोर्ट ने इस विशाल Haridwar land scam की एक-एक परत खोल दी, जिसके बाद 3 जून 2025 को इन 12 अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था।
विजिलेंस जांच और धामी सरकार का जीरो टॉलरेंस संदेश
प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य के 25 साल के इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब किसी Haridwar land scam जैसे भूमि घोटाले में एक साथ इतने बड़े स्तर के नौकरशाहों पर इतनी त्वरित और कठोर कार्रवाई की गई हो। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस Haridwar land scam के आरोपियों पर एक्शन लेकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी धन की लूट किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सरकार की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी है। विजिलेंस की जांच के साथ-साथ सरकार ने उन सभी विकास कार्यों का ‘स्पेशल ऑडिट’ कराने का भी निर्देश दिया है, जो निलंबित नगर आयुक्त वरुण चौधरी के कार्यकाल में पास हुए थे। इसके अलावा, जिन किसानों और बिचौलियों को 54 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, उनके बैंक खाते तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिए गए हैं और अब पूरे पैसे की ‘रिकवरी’ (वसूली) की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर शुरू कर दी गई है।
भविष्य के लिए एक बड़ा सबक
प्रशासनिक गलियारों में इस Haridwar land scam के बाद एक खौफ और सतर्कता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस Haridwar land scam के बाद अब पूरे उत्तराखंड में नगर निगमों और सरकारी विभागों द्वारा की जाने वाली भूमि खरीद के नियमों में भारी सख्ती आएगी। अब कोई भी अधिकारी बिना पारदर्शी ‘लैंड कमेटी’ की मंजूरी के फैसले लेने की हिम्मत नहीं करेगा।
निष्कर्ष के तौर पर, यह Haridwar land scam केवल कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ‘केस स्टडी’ बन गया है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो बड़े से बड़े रसूखदार अधिकारी को भी कानून के दायरे में लाया जा सकता है। आने वाले दिनों में विजिलेंस की विस्तृत जांच से इस Haridwar land scam में शामिल कुछ और सफेदपोश चेहरों के बेनकाब होने की प्रबल संभावना है।
