Ganga Dashehara: हरिद्वार-संगम-काशी से लेकर उज्जैयनी-नासिक और ओंकारेश्वर में भी हर-हर महादेव की गूंज

Ganga Dashehara: हरिद्वार-संगम-काशी से लेकर उज्जैयनी-नासिक और ओंकारेश्वर में भी हर-हर महादेव की गूंज

Ganga Dashehara देशभर में आज सनातन आस्था का महापर्व ‘गंगा दशहरा’ बेहद हर्षोल्लास, पारंपरिक रीति-रिवाजों और अटूट श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के इस पावन अवसर पर सुबह की पहली किरण के साथ ही देश की तमाम पवित्र नदियों, तालाबों और सरोवरों पर श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा है। उत्तराखंड के हरिद्वार में विश्व प्रसिद्ध ‘हर की पौड़ी’ से लेकर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, अयोध्या, मथुरा और वाराणसी (काशी) के पावन तटों पर सुबह के ब्रह्ममुहूर्त से ही आस्था की डुबकी लगाने का सिलसिला अनवरत जारी है।

‘हर की पौड़ी’ पर गूंजा ‘हर-हर गंगे’ का उद्घोष, सुरक्षा के कड़े इंतजाम

देवभूमि उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) के पावन अवसर पर अलौकिक और विहंगम नजारा देखने को मिल रहा है। ‘हर की पौड़ी’ के सभी प्रमुख घाट श्रद्धालुओं से पूरी तरह पटे हुए हैं। कड़कड़ाती सुबह और पहाड़ों से आ रहे ठंडे पानी की परवाह किए बिना लाखों भक्तों ने पतित पावनी मां गंगा में डुबकी लगाकर पुण्य कमाया। पूरा मेला क्षेत्र ‘हर-हर गंगे, नमामि गंगे’ और ‘जय मां गंगे’ के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान है।

भीषण गर्मी के इस मौसम में उमड़ने वाली भारी भीड़ और वीआईपी मूवमेंट को देखते हुए स्थानीय प्रशासन, मेला पुलिस और पीएसी बल पूरी तरह मुस्तैद हैं। चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन के जरिए निगरानी रखी जा रही है। हर की पौड़ी की ओर जाने वाले रास्तों पर वाहनों का रूट डायवर्जन किया गया है ताकि पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की असुविधा का सामना न करना पड़े। जगह-जगह स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा पेयजल और चिकित्सा शिविर भी लगाए गए हैं।

सिर्फ हरिद्वार ही नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रमुख धार्मिक केंद्रों पर भी सुबह से गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) के पावन पर्व पर स्नान-दान आदि के साथ विशेष अनुष्ठान, मंत्रोच्चार, यज्ञ और हवन किए जा रहे हैं।

  • प्रयागराज (त्रिवेणी संगम): तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी संगम के विस्तीर्ण तट पर आस्था का महासंगम देखने को मिल रहा है। कड़कती धूप के बावजूद तड़के तीन बजे से ही संगम घाटों पर पैर रखने की जगह नहीं है। श्रद्धालु संगम में पवित्र स्नान के बाद तट पर बैठे पुरोहितों से विधिवत संकल्प करा रहे हैं और अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और जल का दान कर रहे हैं।
  • वाराणसी (अविनाशी काशी): बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, मणिकर्णिका घाट सहित सभी 84 घाटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा हुआ है। सुबह की विशेष सुप्रभातम आरती के बाद से ही गंगा की लहरों पर आस्था की नावें तैरती दिख रही हैं। शाम को यहां मां गंगा की विश्वप्रसिद्ध महाआरती का अत्यंत भव्य और विशेष आयोजन की व्यवस्था है, जिसके लिए घाटों को गेंदे के फूलों और बिजली की झालरों से दुल्हन की तरह सजाया गया है।
  • अयोध्या (पावन सरयू तट): भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या में भी गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) का उल्लास चरम पर है। पावन सरयू नदी के नया घाट और लक्ष्मण घाट पर स्थानीय निवासियों के साथ-साथ बाहरी जिलों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने स्नान किया। सरयू स्नान के बाद भक्तों की लंबी कतारें कनक भवन, हनुमान गढ़ी और प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर में दर्शन के लिए देखी जा रही हैं।

जानिए क्या है गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में गंगा दशहरा के पर्व  (Ganga Dashehara) का एक अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली स्थान है। पौराणिक मान्यताओं और प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन ही आदिगंगा, पतित पावनी मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों (राजा सगर के 60 हजार पुत्रों) की आत्मा की शांति, उनके संचित पापों के शमन और उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए हजारों वर्षों तक अत्यंत कठिन और निराहार तपस्या की थी। भगीरथ के इस अदम्य प्रयास और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने को तैयार हुईं, लेकिन उनका वेग इतना तीव्र था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा के वेग को बांधा और फिर अत्यंत शांत रूप में पृथ्वी पर प्रवाहित किया। यही कारण है कि मां गंगा को ‘भागीरथी’ के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन को गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दस प्रकार के महापापों से मुक्ति (दशहरा का वास्तविक अर्थ)

संस्कृत व्याकरण और शास्त्रों के अनुसार, ‘दशहरा’ शब्द का सीधा अर्थ होता है ‘दस पापों को हरने वाला’ या ‘दस दोषों का नाश करने वाला’। हिंदू धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि इस विशेष तिथि पर जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक गंगा जी में स्नान करता है या असमर्थ होने पर अपने घर में ही गंगाजल मिलाकर ध्यान करता है, उसके जीवन के 10 तरह के गंभीर पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं।

कायिक पाप (शारीरिक दोष): इसके अंतर्गत बिना अनुमति किसी की वस्तु लेना या चोरी करना, किसी भी जीव के प्रति हिंसा करना अथवा पराई स्त्री या पुरुष के प्रति अनैतिक संबंध या गमन करना शामिल है।

वाचिक पाप (वाणी दोष): इसके अंतर्गत किसी के प्रति अत्यंत कटु या कठोर वचन बोलना, जानबूझकर असत्य या झूठ बोलना, किसी की पीठ पीछे चुगली या निंदा करना और बिना किसी उद्देश्य के व्यर्थ की बातें या प्रलाप करना आता है।

मानसिक पाप (सोच या विचार के दोष): इसके अंतर्गत किसी अन्य व्यक्ति के धन या संपत्ति को अन्यायपूर्ण तरीके से हड़पने का विचार मन में लाना, किसी निर्दोष व्यक्ति का अहित या बुरा करने की योजना बनाना और धर्म व सत्य के मार्ग से भटककर असत्य कर्मों में मन लगाना शामिल है।

हस्त नक्षत्र, व्यतिपात और आनंद 

इस वर्ष गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) के पर्व पर ग्रहों और नक्षत्रों का अत्यंत दुर्लभ व शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि के साथ हस्त नक्षत्र, व्यतिपात योग और आनंद योग का मिलन हो रहा है। ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड विद्वानों के अनुसार, इस महासंयोग में किया गया कोई भी धार्मिक कार्य, मंत्र जाप, हवन, तप और दान ‘अक्षय फल’ प्रदान करता है। अक्षय का अर्थ है जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता और वह पीढ़ी दर पीढ़ी शुभता प्रदान करता रहता है।

भीषण गर्मी में शीतलता और जीवों के लिए दान परंपरा

गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) का यह पावन पर्व भारतीय उपमहाद्वीप में भीषण गर्मी और नौतपा के ठीक आसपास आता है, जब सूर्य देव अपने पूर्ण ताप पर होते हैं। यही कारण है कि ऋषियों-मुनियों ने इस पर्व के साथ व्यावहारिक दान की परंपरा को जोड़ा है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन स्नान के पश्चात मिट्टी का नया घड़ा (मटका), सत्तू, हाथ का पंखा, खरबूजा, तरबूज, पका हुआ आम, सुराही और शीतल जल का दान करना सर्वोत्तम और परम कल्याणकारी माना गया है। यह परंपरा हमें भीषण तपन के बीच समाज के वंचित वर्ग की सहायता करने, जीवमात्र को शीतलता पहुंचाने और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहने का एक अमूल्य मानवीय संदेश देती है।

देश की अन्य पावन नदियों के तटों पर भी आस्था का ज्वार

गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) का यह महापर्व केवल गंगा नदी के किनारे तक ही सीमित नहीं है। सनातन परंपरा में देश की सभी पवित्र नदियों को गंगा के समान ही पूजनीय माना गया है। यही कारण है कि आज यमुना, सरयू, क्षिप्रा, नर्मदा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों के किनारे बसे ऐतिहासिक तीर्थ शहरों में भी श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।

मथुरा और वृंदावन (पावन यमुना तट): भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली ब्रजभूमि में यमुना नदी के घाटों पर सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल है। मथुरा के विश्राम घाट और वृंदावन के केशी घाट पर हजारों श्रद्धालुओं ने यमुना जी में स्नान किया। ब्रज में मान्यता है कि आज के दिन यमुना जी में स्नान करने से यमराज के भय से मुक्ति मिलती है। स्नान के बाद भक्तों ने ठाकुर बांके बिहारी और द्वारकाधीश मंदिर में विशेष दर्शन किए।

उज्जैन (पुण्यसलिला क्षिप्रा तट): मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकाल की नगरी के प्रमुख रामघाट पर तड़के से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई है। मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी में पवित्र स्नान के बाद श्रद्धालु भगवान महाकालेश्वर के दर्शन के लिए कतारों में खड़े नजर आए। यहां घाटों पर पुरोहितों द्वारा विशेष दुग्धाभिषेक और मां क्षिप्रा की आरती की जा रही है।

ओंकारेश्वर और जबलपुर (मां नर्मदा तट): मध्य प्रदेश के ही जबलपुर के भेड़ाघाट, ग्वारीघाट और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब देखा गया। ‘नर्मदे हर’ के उद्घोष के साथ भक्तों ने सूर्योदय के समय नर्मदा जी में डुबकी लगाई। पुराणों में नर्मदा जी के दर्शन मात्र को ही अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है, और आज के विशेष दिन यहां स्नान का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

नासिक (गोदावरी तट – दक्षिण गंगा): महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध रामकुंड में हजारों श्रद्धालुओं ने भी गंगा दशहरा (Ganga Dashehara) मनाते हुए आस्था की डुबकी लगाई। दक्षिण भारत में गोदावरी को ‘दक्षिण गंगा’ के रूप में पूजा जाता है, इसलिए गोदावरी तट पर बसे इस प्राचीन तीर्थ शहर में गंगा दशहरा का महत्व उत्तर भारत की तरह ही बेहद खास होता है। भक्तों ने स्नान के बाद त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग और पंचवटी के मंदिरों में पूजा-अर्चना की।

 

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Rajeev Sharma

Chief Editor & CEO PhD, LLB
Fact Checked & Editorial Guidelines
Reviewed by: Subject Matter Experts

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