Khamenei के ‘एनकाउंटर’ पर सोनिया गांधी के आंसू

Khamenei के ‘एनकाउंटर’ पर सोनिया गांधी के आंसू

Khamenei Encounter: बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद सोनिया गांधी रोयीं थीं। आज एक बार फिर सोनिया गांधी रो रही हैं। सोनिया गांधी दुख व्यक्त कर रही हैं। इस बार एनकाउंटर भारत में नहीं, ईरान में हुआ है। सैयद अली हुसैनी खामेनई का एनकाउंटर किया गया है। एनकाउंटर करने वाले ट्रंप और नेतन्याहू हैं। इस एनकाउंटर में पीएम नरेंद्र मोदी का हाथ नहीं है, फिर भी सोनिया गांधी रो रही हैं। सोनिया गांधी एक बार फिर पीएम नरेंद्र मोदी को कोस रही हैं। खामेनेई की मौत पर सोनिया ने अपने आंसू एक अंग्रेजी अखबार में बहाए हैं। सोनिया गांधी को खामेनेई की मौत से ज्यादा इस बात का दुख है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने खामेनेई की मौत पर दुख व्यक्त क्यों नहीं किया। खामेनेई ईरान के सर्वोच्च रिलीजियस नेता थे। कश्मीर पर खामेनेई हमेशा भारत के खिलाफ रहे। वो भारत और फिलिस्तीन के मुसलमानों हालत एक जैसी बताकर भारत के खिलाफ विष वमन करते थे। खामेनेई स्त्रियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध थे। खामेनेई ने हजारों निर्दोष ईरानियों को मौत की सजा दिलवा दी। सोनिया गांधी इन बातों को भूल कर पीएम मोदी पर सूली पर चढ़ा देना चाहती हैं। मगर वो भूल गई हैं कि इस तरह के विधवा विलाप (एक मुहावरा) से सोनिया गांधी पीएम नरेंद्र मोदी का नहीं बल्कि भारत का विरोध कर चुकी हैं।

खामेनेई के लिए भारत की सहानुभूति! आखिर क्यों?

खामेनेई कश्मीर पर हमेशा भारत के खिलाफ जहर उगलते थे। उनके लिए शोक या ‘नैतिक सहानुभूति’ जताने का कोई तार्किक कारण भारत सरकार के पास नहीं है। सोनिया गांधी को समझना होगा कि अब देश की जनता मानती है कि यदि कोई देश या नेता भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है, तो उसके साथ शठे शाठ्यम जैसा व्यवहार होना चाहिए।

सोनिया को ओल्ड माइंड सेट अपडेट करना होगा

सोनिया गांधी का पीएम मोदी को निशाना बनाना यह दर्शाता है कि वे अभी भी उस पुराने माइंडसेट में जी रही हैं, जहाँ सत्ता में रहने के लिए ‘विदेशी शक्तियों’ या ‘विशिष्ट लॉबी’ का समर्थन-सहानुभूति-संवेदना व्यक्त करना अनिवार्य माना जाता था। समय बहुत बदल चुका है। ज्योपॉलिटिक्स में बहुत परिवर्तन हो चुका है। सोनिया गांधी को अगर अपना अस्तित्व बचा कर रखना है तो उन्हें ‘अपडेट’ करना होगा।

सोनिया की चिंता से भारत का ‘अहित’

पिछले काफी समय से देखा जा रहा है कि सोनिया गांधी ही नहीं बल्कि कांग्रेस की चिंता भारत के हितों की रक्षा में नहीं, बल्कि उन वैश्विक शक्तियों के प्रति अपनी वफादारी दिखाने में है, जो कभी भारत को पसंद नहीं करती हैं। भारत अब उस दौर में है जहाँ ‘राष्ट्र’ सर्वोपरि है। जो इस बदलाव को नहीं समझ पा रहे, वे इतिहास के पन्नों में पीछे छूट रहे हैं। भारतीय जनमानस का लक्ष्य स्पष्ट है: एक समृद्ध, सुरक्षित और आत्म-सम्मानित भारत।

सोनिया का कथित आदर्शवाद बनाम मोदी का यथार्थ

सोनिया गांधी ने अपने लेखे में कथित ‘आदर्शवादी’ विदेश नीति अपनाने की वकालत की है। सोनिया गांधी भूल रही हैं कि भारत की विदेश नीति अब ‘यथार्थवाद’ पर आधारित है। मध्य एशिया में चल रहे इस संकट के दौरान भारत की विदेश नीति का मूल अब “अपने हितों की सुरक्षा” है, न कि दूसरों के झगड़ों में टांग अड़ा करके अपनी ऊर्जा बर्बाद करना है।

भारत पर खामेनेई के ज़हर बुझे तीर

सोनिया गांधी के लेख का सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए वो उस अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत भारत सरकार की प्रतिक्रिया न आने से दुखी हैं जिसने जिंदगी भर भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की। विशेषकर कश्मीर पर लगातार जहर उगला है। खामेनेई ने भारत की संप्रभुता को कई बार चुनौती दी। कांग्रेस की यह मांग कि भारत को खामेनेई के लिए स्टैंड लेना चाहिए, उस कूटनीतिक यथार्थ को अनदेखा करती है जहाँ भारत को उन देशों के साथ भी संबंध निभाने हैं जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक हैं।

सोनिया गांधी की वैचारिक विकलांगता

सोनिया गांधी गलतफहमी में हैं। वो सरकार की चुप्पी को ‘पलायन’ (Abdication) बता रही हैं। वास्तव में भारत का यह कदम ‘रणनीतिक संयम’ (Strategic Restraint) है। अरब देशों में लाखों भारतीय रहते हैं और ईरान के साथ चाबहार जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट हैं। ऐसी स्थिति में, शोर मचाने के बजाय ‘संवाद और कूटनीति’ का आह्वान करना एक परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। भारत ने वही किया जो एक जिम्मेदार राष्ट्र को करना चाहिए—तनाव कम करने की अपील, न कि किसी के पक्ष में युद्ध के मैदान में कूदना।

भारत मोरल पुलिस नहीं

सोनिया गांधी ने भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ के नेता के रूप में बोलने की अपेक्षा की है। सोनिया गांधी को समझना चाहिए कि भारत अब किसी का ‘प्रॉक्सी’ नहीं है, न ही वह किसी गुट के दबाव में काम करता है। एससीओ, ब्रिक्स और क्वाड जैसे मंचों पर भारत की अलग पहचान का कारण भी यही है। भारत का उद्देश्य मोरल पुलिसिंग करना नहीं है, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को मजबूत करना है।

कांग्रेस को घायल कर सकता है सोनिया गांधी का दुधारी हथियार

दरअसल, सोनिया गांधी इस लेख के जरिए पीएम मोदी की हालिया इजरायल यात्रा पर विवाद खड़ा करना चाहती हैं। ताकि संसद का सत्र शुरू होते ही हंगामा किया जा सके। वो इस मुद्दे को घरेलू राजनीति का हथियार बनाना चाहती हैं। सोनिया गांधी खामेनेई के बहाने अगर वो शिया मुसलमानों की सहानुभूति बटोरना चाहती हैं तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि जिन पांच राज्यों क्रमशः असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में लगभग सवा पांच करोड़ मुसलमान हैं, जिसमें से शिया मुसलमान सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत ही है। तो क्या खामेनेई की मौत पर शोर मचाने से 85 से 90 फीसदी सुन्नी मुसलमान कांग्रेस और सोनिया गांधी से नाराज तो नहीं हो जाएंगे।

भारत की कूटनीतिक एकता पर हमला

इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखने से पहले सोनिया गांधी को यह भी सोचना चाहिए था जब देश का कोई बड़ा विपक्षी नेता किसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर ‘पीएम को घेरने’ के उद्देश्य से लेख लिखता है, तो उससे भारत की कूटनीतिक एकजुटता को कमजोर कर सकता है।

राहुल गांधी ने भारत पर ‘आक्रमण’ करने का अमेरिका-यूरोप को दिया थानिमंत्रण

सच्चाई तो यह है कि सोनिया गांधी से कूटनीतिक एकजुटता की अपेक्षा करना ही बेमानी है। चार साल पहले राहुल गांधी ने लंदन प्रवास थे। इस दौरान ४-६ मार्च २०२३ को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में उन्होंने अत्यंत विवादास्पद बयान दिया था। राहुल गांधी ने कहा था कि “भारत में लोकतंत्र के साथ बर्बर व्यवहार हो रहा है- लोकतंत्र की हत्या हो रही है और अमेरिका-यूरोप चुप्पी साधे बैठे हैं।“ राहुल गांधी ने भारत की संप्रभुता पर आक्रमण के लिए अमेरिका-यूरोप को निमंत्रण दिया था। सोनिया गांधी या किसी भी कांग्रेसी नेता ने राहुल गांधी के उस बयान पर कभी ऐतराज नहीं जताया। इन परिस्थितियों में सोनिया गांधी अगर पीएम मोदी के बहाने भारत देश को अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास कर रही हैं तो अचम्भा नहीं होना चाहिए।

दीमकों से देश को मुक्त करना होगा

…लोगों को दीमाग लगे ताले और आंखों लगे चश्मे हटाने चाहिए और सोचना चाहिए कि दीमक की तरह उपजे नेताओं से देश को कैसे मुक्त करवाना है!

(लेखक- यगदत्त राजीव शर्मा, संप्रति वरिष्ठ पत्रकार-विश्लेषक)

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Rajeev Sharma

Chief Editor & CEO PhD, LLB

more then 30 yrs experience of Print and Electronic media. Hold the key positions in various popular media organizations as Bureau chief, Special Correspondent-investigative stories, News Editor.

Areas of Expertise: Reporting and Analysis on Contemporary, Political, Social, and Geopolitical Issues
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Reviewed by: Subject Matter Experts

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