Iran के साथ ‘हित’ तो Israel भारत का ‘Time Tested’ दोस्त

Iran के साथ ‘हित’ तो Israel भारत का ‘Time Tested’ दोस्त

अमेरिका और Israel अगर Iran के खिलाफ जंग हार जाता है तो फिर अगला निशाना भारत ही होगा। इजरायल के बाद इस पूरे क्षेत्र में एक मात्र पहला प्रभावी भारत नॉन मुस्लिम देश है। इसलिए कोई कुछ भी कहे, ईरान की हार में ही भारत का हित है। अब तो भारतीयों को जाग जाना चाहिए। भारत में जिस तरह से खामेनेई के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं वो तो बहुत खतरनाक है। यह वही खामेनेई है जो भारत में इस्लामी शासन के खुत्बे देता था। वो कहता था कि इस्लामी शासन आने पर ही कश्मीर में शरीयत का शासन होगा। ऐसे शख्स के लिए भारत में प्रदर्शन हो रहे हैं। इन सारी बातों को हर एक भारतीय को गंभीरता से सोचना होगा। यही समय है। सही समय है। वरना भूल जाओ सनातन धर्म को।

वक्त का तकाज़ा

यह समय का तकाजा है कि अमेरिका-इजरायल ईरान (Iran) के खिलाफ जंग हर हाल में जीते। अगर ऐसा नहीं होता है तो बहुत जल्दी सभी 57 मुस्लिम देश इकट्ठा होकर भारत पर हमला करेंगे। हमला केवल बम-बंदूक और गोलों से नहीं, हमारा तेल रोक देंगे, हम पर साइबर हमला करेंगे, हमारे भीतर बैठे करोड़ों-करोड़ मीर जाफरों के माध्यम से गृह युद्ध करेंगे। वो हम पर बाहर और भीतर दोनों ओर से हमले करेंगे। तब हमारी ‘सनातन संतानें’ जो किसी तरह अपने अस्तित्व को बचा पाएंगी वो न हमें कोसेंगी बल्कि हम पर थूकेंगी।

अमेरिका की दुश्मनी से दोस्ती ज्यादा खतरनाक

हालांकि, यह सच है कि अमेरिका की दुश्मनी से दोस्ती ज्यादा खतरनाक है। मगर हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए इस समय अमेरिका का साथ देना होगा। इजरायल को भी अगर आप घोर नस्लवादी मानते हो तो भी हर भारतीय को इजरायल का ही साथ देना चाहिए। आजादी के बाद से आज तक का इतिहास देखो इजरायल भारत के साथ खड़ा रहा है। भारत को ओवर्टली और कोवर्टली मदद करता रहा है। इजरायल और भारत के बीच केवल एक विषय अपवाद है। इस विषय पर संशोधन और हितधारण उभय पक्षीय की संभावनाएं हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने इजरायल को खुले तौर पर 2014 के बाद ही स्वीकार किया है। जबकि इससे पहले करगिल जंग में इजरायल की मदद भारत की जीत का एक बड़ा कारण थी।

भारत सॉफ्ट पावर नहीं स्मार्ट पावर

यह सच है कि आज की ज्योपॉलिटिक्स में भारत एक ‘सॉफ्ट पावर’ से ‘स्मार्ट पावर’ की ओर बढ़ रहा है। इजरायल के बाद भारत एकमात्र प्रभावशाली गैर-मुस्लिम देश है। इसलिए भारत की संस्कृति और सनातन सभ्यता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। संभवतः इसी खतरे को देखते हुए मौजूदा भारतीय नेतृत्व भावनाओं से अधिक राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहा है।

इजरायल की ओवर्ट-कोवर्ट मदद

हम भारत के लोग चाहे किसी भी मत या संप्रदाय को मानते हों, हम सब को 1947 से आज तक देखते हैं कि इजरायल ने भारत के साथ क्या किया है और हमने इजरायल के साथ क्या किया। 1962, 1965 और 1971 के युद्ध काल को याद कीजिए। कोई औपचारिक कूटनीतिक संबंध न होने के बावजूद इजरायल ने भारत को हथियारों और खुफिया जानकारी मुहैया करवाई। इजरायल ने बिना किसी अपेक्षा के भारत को बिन मांगे मदद का प्रस्ताव किया न केवल प्रस्ताव दिया बल्कि समय पर मदद की।

कारगिल युद्ध में इजरायली लेजर गाइडेड बम

साल 1999 का कारगिल युद्ध भारत-इजरायल संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। जब पाकिस्तान की सेना ऊंचाइयों पर बैठी थी, तब इजरायल ने भारत को ‘लेजर-गाइडेड मिसाइल’ और ‘यूएवी’ (ड्रोन) उपलब्ध कराए, जिससे न केवल युद्ध की दिशा बदली बल्कि निर्णायक जीत निश्चित हुई। यह उस समय की अटलजी की बैसाखी सरकार की विवशता थी कि भारतीय सेनाओं ने सीमा पार नहीं की, वरना पूरा सियाचिन आज भारत की सीमाओं के भीतर होता।

पर्दे के पीछे इजरायल से संबंध

इतने महत्वपूर्ण सहयोग के बावजूद भारत ने लंबे समय तक इजरायल के साथ संबंधों को पर्दे के पीछे रखा ताकि अरब मुस्लि देशों के साथ संबंधों पर असर न पड़े। 2014 से पहले की भारतीय सरकारों में मुस्लिम देशों का भय रहता था। 2014 के बाद, प्रधान मंत्री मोदी की इजरायल यात्रा ने इस संबंध को खुलेआम स्वीकारा बल्कि रणनीतिक साझेदारी में बदल कर इतिहास की गल्तियों में बड़ा सुधार किया।

इजरायल को भारत-ईरान रिश्तों पर आपत्ति नहीं

एक खास बात और, इजरायल (Israel) ने भारत के अरब-मुस्लिम देशों से संबंधों पर कभी कोई उंगली नहीं उठाई। मौजूदा संघर्ष के दौरान भी इजरायली पीएम नेतन्याहु ने भारत के हित और विदेशनीति का समर्थन ही किया है विरोध नहीं। इसके कुछ उदाहरण देखिए-
– भारत के लिए ईरान का महत्व ‘चाबहार’ बंदरगाह के कारण है, जो पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की व्यापारिक पहुँच सुनिश्चित करता है।
– ईरान (Iran) लंबे समय तक भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है।
– ईरान (Iran) के सर्वोच्च इस्लामिक नेता समय-समय पर कश्मीर और भारत के आंतरिक मामलों पर विवादित बयान दिए हैं, जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा यानी एकता अखण्डता को पर प्रभाव पड़ता है।

अमेरिका का दोहरा चरित्र

दूसरी ओर, अमेरिका की दुश्मनी से अधिक दोस्ती खतरनाक है। अमेरिकी चरित्र दोहरा है-धोखेबाज है। मगर भारत-अमेरिका संबंध वर्तमान में ‘वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर हैं। तेजी से बदल रहे ज्योपॉलिटिकल परिदृश्य में अमेरिका चीन के विरुद्ध भारत को एक ताकत के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। भारतीय नेतृत्व भी इस बात को अच्छी तरह से समझता है। इसलिए वो अमेरिका का सहयोगी के तौर पर ही आगे बढ़ रहा है। भारतीय नेतृत्व ने साबित कर दिया है कि भारत की अपनी स्वायत्तता सर्वोपरि है। इसी सिद्धांत के साथ भारत मध्य एशिया के संघर्ष में उभय पक्षीय कूटनीति अपना रहा है। एक बार फिर थोड़ा सा इतिहास में झांकते हैं और जानते हैं कि सनातन संस्कृति को कितने जख्मों के साथ जीवित है।

इस्लामिक शासन से पहले भारत-परसिया संबंध

ईरान (Iran) में इस्लामी अतिक्रमण से पहले मौजूद सांस्कृतिक सभ्यता भारत की वैदिक सभ्यता के बेहद नजदीक थी। इस्लामी अतिक्रमण के बाद सांस्कृतिक दूरियां बढ़ती गईं। परसिया से फारस और फारस से ईरान हो गया। शाह का शासन आया और फिर 1979 में इस्लामिक कट्टरवाद की क्रांति आई। उसके बाद का इतिहास सबके सामने है।

इजरायल को नैतिक समर्थन क्यों जरूरी

• अफगानिस्तान, जिसे प्राचीन काल में ‘उपगणस्थान’ और ‘गांधार’ कहा जाता था, कभी वैदिक और बौद्ध संस्कृति का महान केंद्र था। आचार्य चाणक्य और माता गांधारी का संबंध इसी भूमि से था।
• कट्टरपंथ का उदय: ७वीं शताब्दी से शुरू हुए इस्लामी आक्रमणों ने यहाँ की मूल सनातन और बौद्ध पहचान को धीरे-धीरे मिटा दिया।
• परिणाम: जो भूमि संस्कृत श्लोकों और बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं (बामियान) के लिए जानी जाती थी, वह आज ‘शरिया’ और ‘तालिबान’ के सबसे कट्टर स्वरूप का केंद्र बन गई है। अफगानिस्तान इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि जब बहुसंख्यक आबादी का धर्मान्तरण होता है, तो उस भूमि का इतिहास और संस्कृति पूरी तरह ‘इरेज’ (मिटा) दी जाती है।

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इंडोनेशिया

• इंडोनेशिया दुनिया का सबसे अनूठा उदाहरण है। यहाँ आज भी गरुड़ राष्ट्रीय विमान सेवा पर भगवान गणेश मुद्रा पर अंकित हैं और रामायण-महाभारत की गाथाएं जन-जीवन का हिस्सा हैं। फिर इंडोनेशिया इस्लामिक देश है।
• भारत के साथ दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तलवार की नोक पर इस्लाम फैलाया गया इसके उलट इंडोनेशिया में व्यापार और सूफीवाद के जरिए धीरे-धीरे धर्मान्तरण हुआ। आज इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है।
• इंडोनेशिया से यह सबक मिलता है कि ‘सांस्कृतिक प्रतीक’ कुछ समय तक जीवित रह सकते हैं, लेकिन एक बार जब समाज का धार्मिक आधार बदल जाता है, तो वह देश वैश्विक ‘उम्माह’ और ‘इस्लामी ब्लॉक’ का हिस्सा बन जाता है, जिससे उसकी मूल ‘सनातन आत्मा’ केवल एक प्रदर्शनी की वस्तु बनकर रह जाती है।

इजरायल (Israel) , अपनी संस्कृति-सभ्यता के संरक्षण के लिए किसी भी हद तक जाने का माद्दा रखता है। यदि भारत के लोगों ने भी ऐसा ही सोचा होता तो भारत की सीमाएं इतनी संकुचित नहीं होतीं।

भारत के भीतर का परिदृश्य

भारत के भीतर कुछ राज्यों की बदलती जनसांख्यिकी डेमोग्राफी  ‘सभ्यतागत खतरे’ की घंटी बजा रही है-
• पश्चिम बंगाल जो विभाजन के समय जो हिंदू बहुल था, उसके कई जिले आज अपनी जनसांख्यिकी खो चुके हैं। घुसपैठ और तुष्टीकरण के कारण वहां का सांस्कृतिक ढांचा चरमरा गया है। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रों में ‘सनातन परंपराओं’ का निर्वहन करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
• केरल जिसे ‘ईश्वर का अपना देश’ कहा जाता था, वह आज पीएफआई जैसी कट्टरपंथी विचारधाराओं का गढ़ बन गया है। ‘लव जिहाद’ और जनसांख्यिकीय असंतुलन ने वहां के मूल सनातन समाज को हाशिए पर धकेल दिया है।
• असम और पूर्वोत्तर में घुसपैठ ने असम के कई जिलों में स्थानीय संस्कृति को अल्पसंख्यक बना दिया है। सनातन संतों के  मठ-मंदिरों की जमीनों पर अवैध कब्जे इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

सनातन संस्कृति की रक्षा के इजरायल मॉडल क्यों जरूरी

सनातन धर्म केवल एक “पूजा पद्धति” नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दर्शन है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वधर्म समभाव’ की बात करता है। लेकिन इतिहास सिखाता है कि यह उदारता तभी तक सुरक्षित है जब तक सनातन को मानने वाले बहुसंख्यक हैं। भारत की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। जम्मू-कश्मीर में लगभग 80%, लक्षद्वीप में 96%, असम 40%, और केरल में 35-40% और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिले की 40% आबादी मुस्लिम  हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश, बिहार-झारखण्ड में भी मुस्लिम आबादी का प्रतिशत काफी ऊँचा है। यदि जनसांख्यिकीय संतुलन ऐसे ही बिगड़ता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता खुद खत्म हो जाएगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भारतीय सनातन संस्कृति की समाप्ति इसके जीवित प्रमाण हैं। यदि अभी नहीं जागे तो फिर इजरायल की तरह अस्तित्व को बचाने जैसा संघर्ष करना पड़ेगा, तो क्यों न अभी से इजरायल (Israel) मॉडल अपना लिया जाए।

लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा

इस दुनिया से सहिष्णु और शांतिवादी सभ्यताओं को असहिष्णु और कट्टरपंथी लोग हमेशा मिटाते चले आए हैं। अगर लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा करनी है तो भारत की सनातन संस्कृति की रक्षा करनी पड़ेगी। इसके लिए हमें इजरायल जैसे कदम उठाने पड़ेंगे। इजरायल ने बिना उकसावे के कभी हमले नहीं किए हैं। अरब-मुस्लिम देश  शुरू से ही  डेथ टू इजरायल के नारे लगाते रहे हैं। मगर इजरायल (Israel) ने किसी मुस्लिम देश के बारे में ऐसा कोई नारा नहीं दिया। सच्चाई तो यह है कि इजरायल की लगभग 20 फीसदी आबादी अरब मूल की है। सभी को समान अधिकार हैं। भारत भी सहअस्तित्व में विश्वास करता है, मगर भारत में सनातन के साथ क्या हो रहा है- यह सोचने का नहीं कुछ करने का विषय है।

नहीं जागे तो हमें गालियां देंगी हमारी संतानें

भारतीय आबादी में में तेजी से फैल चुकी कट्टरपंथी मुस्लिम विचारधारा के खतरे के खिलाफ अब भी हम खड़े नहीं हुए तो या आगामी संकट को पहचानने से इंकार करते रहे तो हमारी ‘सनातन संतानें’ अपने ही घर में शरणार्थी बन जाएंगी या उन्हें अपनी पहचान बचाने लिए एक बार फिर शलवारें पहननी पड़ सकती हैं। मंदिरों से स्वास्तिक चिह्न मिटाने पड़ सकते हैं, घण्टी-शंख की जगह अजान सुनना ही विवशता होगी। हम अभी नहीं जागे तो हमारी संताने हमें नपुंसक, अदूरदर्शी, डरपोक, लालची और देश में लगी दीमक जैसे नामों से पुकारेंगे।इजरायल हमारा टाइम टेस्टेड दोस्त है…! उससे सीख लेने की जरूरत है।

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काफिरों के खिलाफ जिहाद

एक बात और जब बात गैर-मुस्लिमों या उनके शब्दों में ‘काफिरों’ के विरुद्ध संघर्ष की आती है, तो मुस्लिम जगत शिया-सुन्नी जैसी आपसी विवाद  अक्सर गौण हो जाते हैं। ला इलाहा इल्लल्लाह का नारा केवल एक मज़हबी नारा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामरिक एकजुटता का उपकरण है।

कश्मीर पर मुस्लिम उम्माह भारत के खिलाफ

इतिहास गवाह है कि जब भी भारत ने अपनी संप्रभुता का कड़ा प्रदर्शन किया है, तब ओआईसी जैसे 57 देशों के संगठन ने एक स्वर में भारत की आलोचना की है। यह एकजुटता व्यवहारिक रूप से एक ग्लोबल ब्लॉक की तरह काम करती है, जो आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के माध्यम से अपनी बात मनवाने का प्रयास करती है। अब तो भारत में मुस्लिम आबादी भी तेजी से बढ़ चुकी है।

इजरायल की तरह भारत पर मुस्लिम देशों के संगठित हमले की आशंका

अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आज भी खाड़ी देशों पर निर्भर है। यदि 57 देश एकजुट होकर तेल की आपूर्ति रोक दें, तो यह भारत की अर्थव्यवस्था निर्मम हमला होगा।

साइबर और इनफॉरमेशन वॉर

डिजिटल युग में प्रोपेगेंडा के जरिए भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को अलग-थलग करना एक संगठित रणनीति का हिस्सा है। तुर्की-पाकिस्तान जैसे देशों ने तो भारत के खिलाफ साइबर युद्ध तो लगातार छेड़ ही रखा है।

भारत के मीर जाफर

भारत के भीतरी मीर जाफर आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जब बाहर से ५७ मुस्लिम देश दबाव बनाएंगे, तब देश के भीतर मौजूद वैचारिक रूप से कट्टरपंथी मुस्लिम तत्व गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं। यह इनसाइड-आउट हमला किसी भी परमाणु बम से अधिक घातक हो सकता है।

इतिहास का सबक: विभाजित हिंदू और संगठित आक्रांता

अतीत का हर पन्ना चीख-चीख कर कहता है कि जब-जब भारतीय समाज अपनी पहचान और सुरक्षा के प्रति लापरवाह हुआ, तब-तब संगठित मजहबी ताकतों ने इस भूमि का भूगोल और इतिहास बदल दिया। कुछ वितंडावादी और सोकॉल्ड प्रोग्रेसिव लोग यह तर्क देते हैं कि जैसा भूतकाल में हुआ वैसा ही भविष्य में भी होगा- ऐसा अब संभव नहीं है, लेकिन गौर करें, शिया ईरान और सुन्नी मुस्लिम देशो में भले ही  छत्तीस का आंकड़ा है, लेकिन कश्मीर या भारत के किसी भी आंतरिक सुरक्षा कानून जैसे CAA और 370 के विरोध में ये सभी देश एक साथ हमलावर हो जाते हैं।

अस्तित्व की लड़ाई में रूस और इजरायल भारत के साथी

इजरायल से पहले रूस हमारा टाइम टेस्टेड दोस्त है। रूस के साथ हमारे रिश्ते हमेशा जग जाहिर रहे हैं। रूस ने बड़े भाई की तरह भूमिका निभाई है। 1971 में जब अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपना सातंवा बेड़ा रवाना किया तो रूस ने भारत के आगे अपना सीना लगा दिया था। रूस इस समय यूक्रेन से नहीं 32 नाटों देशों से एक साथ लड़ रहा है। इजरायल भी दुनिया का वह एकमात्र देश है जिसने मुस्लिम देशों के सामूहिक हमलों को न केवल झेला है, बल्कि उन्हें धूल चटाई है। भारत के लिए रूस और इजरायल एक ‘सर्वाइवल मॉडल’ है।

रूस और इजरायल (Israel) हमें जो हथियार और तकनीक दे रहे हैं वो बिना शर्त हैं।अमेरिका जैसे पश्चिमी देश अक्सर ‘मानवाधिकारों’ का बहाना बनाकर हाथ खींच लेते हैं।

मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकी गिरोह साझा दुश्मन

मुस्लिम कट्टरपंथी गिरोह रूस-इजरायल और भारत के साझा दुश्मन हैं। 1990  से  अभी तक रूस में लगभग 90 मुस्लिम आतंकवादी हमले हुए हैं। इन हमलों में लगभग एक हजार निर्दोष रूसी नागरिकों की जानें गईं। इजरायल (Israel) में यह आंकड़ा हर दो दिनों में तीन आतंकी हमलों का है। लगभग 4 हजार इजरायलियों का खून बहा है। भारत में मुस्लिम आतंकियों का आंकड़ा बहुत भयावह है। जम्मू कश्मीर सहित भारत में 1990  से  अभी तक लगभग 2 हजार आतंकी हमले  22 हजार नागरिक और 5 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।

इस्लाम से भयभीत रहा है भारत!

प्रसंग के तौर पर नवंबर-दिसंबर 1955 की किंग सऊद की भारत यात्रा का विवरण देना जरूरी है। इस दौरान सऊदी शाह अब्दुल अजीज वाराणसी भी गए थे। वाराणसी के जिन रास्तों से सऊदी शाह का काफिला गुजरा उन रास्तों के बीच पड़ने वाले मंदिरों को पर्दों और कनातों से ढांक दिया गया था। इस्लाम से भय या आतंक का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। खौफ का यह आलम था कि मंदिरों को ढांके जाने की खबरे तक अखबार में नहीं छपने दी गईं। वो भला हो नज़ीर बनारसी का जिसने एक शेर लिख कर नेहरू सरकार की पोल दी। वरना यह तथ्य दुनिया के सामने कभी न आता। नज़ीर बनारसी का शेर है- अदना सा ग़ुलाम उनका, गुज़रा था बनारस से, मुंह अपना छुपाते थे, काशी के सनम-खाने।
भारत के खिलाफ 57 मुस्लिम देशों के हमले की आशंका हवा हवाई नहीं है, बल्कि एक कूटनीतिक वास्तविकता है जिसे ‘उम्माह’ के नाम पर हवा दी जाती है। भारत को अपनी सुरक्षा के लिए केवल सीमाओं पर सेना तैनात करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे ‘मीर जाफरों’ को पहचानने और इजरायल जैसी सैन्य व तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करने की आवश्यकता है और इजरायल (Israel) का समर्थन करने की आवश्यकता है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो सनातन संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

(लेखक- यगदत्त राजीव शर्मा, संप्रति वरिष्ठ पत्रकार-विश्लेषक)

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